हो कर विपरीत..रहते है समीप

हो कर विपरीत..रहते है समीप

तुम खामोश किताब.. 
सब एहसास जब्ज़ किये रहते हो.. 
मैं मगर किसी वाद्ययंत्र सी
 ज़ज़्बात अपने कह जाती हूँ.. 
तुम्हे नहीं आता जतलाना
 बस करते हो सब कर जाते हो.. 
मैं मगर बेसब्र बच्चे सी 
जिद कर कोलाहल मचाती हूँ.. 
तुमने जाने कहाँ से सीखा,, 
जो उदासीनता का पाठ पढ़ते हो.. 
मैं मगर हूँ छुईमुई सा पौधा.. 
हर आहट पे प्रतिक्रिया करती हूँ.. 
तुम प्रिय वर्तमान के 
अतीत से ना रखते नाता हो.. 
मैं कल्पना की संगी.. 
नित भविष्य स्वप्न सजाती हूँ.. 
तुम संतृप्त स्थिर सागर से.. 
गहरे और गहरे रहस्य बन जाते हो.. 
मैं सरिता निर्मल नीर की.. 
भटक जग सारा अंततः तुम ही में विलीन हो जाती हूँ..

@priya kumaar©

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