होली में मिला नया जीवन

“अरे!रूक्मणी ये क्या किया तूने?तुझे तो पता था न कि हमारे यहाँ विधवा होली का रंग नहीं लगाती।अब क्या मुहँ दिखाएेंगे लोगों को हम?” बूढ़ी दादी इस बात को बार-बार दोहराए जा रही थीं। दरअसल रूक्मणी बाल विधवा थी ।जब उसे ठीक से शादी का मतलब भी नहीं पता था, उस उम्र में वह ब्याह दी गई ।गौना करके ससुराल में दो बरस नहीं गुज़रे थे कि पति साथ छोड़ कर चल बसा।गाँव की परम्परा थी कि विधवा का मुँडन कराते और किसी भी शुभ अवसर पर विधवा की उपस्थिति वर्जित होती ।

होली में मिला नया जीवन

अरे!रूक्मणी ये क्या किया तूने?तुझे तो पता था न कि हमारे यहाँ विधवा होली का रंग नहीं लगाती।अब क्या मुहँ दिखाएेंगे लोगों को हम?” बूढ़ी दादी इस बात को बार-बार दोहराए जा रही थीं।

दरअसल रूक्मणी बाल विधवा थी ।जब उसे ठीक से शादी का मतलब भी नहीं पता था, उस उम्र में वह ब्याह दी गई ।गौना करके ससुराल में दो बरस नहीं गुज़रे थे कि पति साथ छोड़ कर चल बसा।गाँव की परम्परा थी कि विधवा का मुँडन कराते और किसी भी शुभ अवसर पर विधवा की उपस्थिति वर्जित होती ।

रूक्मणी के साथ भी यही सब होता ।हर बृहस्पतिवार किसी दरिद्र नापित के उस्तरे से रूक्मणी का चूड़ाकर्म होता । पर्वों और शुभ कामों में उसे आने की अनुमति नहीं थी ।अन्य विधवाओं की तरह वह भी इस
कुसंस्कृति को ढो रही थी।

पिछले तीन वर्ष हुए गाँव की पाठशाला में एक युवा मास्टर उम्र कोई 25 वर्ष है उसकी ,जब से आया है उसने गाँव की कई कुप्रथाओं के विरुद्ध आवाज़ उठाई है उनके उन्मूलन के लिए हमेशा प्रयासरत् रहता है।आज तो उसने होली के दिन रूक्मणी पर रंग ही डाल दिया। वह अंजान तो बिल्कुल भी नहीं ।परिणाम जानता था फिर भी उसने रूक्मणी पर रंग डाला।

और रूक्मणी के रंगे हुए गालों को देख बूढ़ी दादी ने आसमान सर पर उठा लिया । अब बिरादरी में उनका हुक्का पानी बंद।पर बेखौ़फ़ मास्टर रूक्मणी पर रंग डाल जा पहुँचा उसके द्वार दादी से उसका हाथ मांगने। अपने सभ्य अंदाज़ में मास्टर ने हाथ जोड़े और फिर दादी से अनुनय किया कि” होली के इन रंगों से मैं रूक्मणी के रंगहीन जीवन को पुनः रंगना चाहता हूँ !

आप अपना आशीर्वचन दीजिए और रूक्मणी का हाथ सदा के लिए मुझे सौंप दीजिए ताकि लोग लोग ये समझ सकें कि विधवा को भी नया जीवन जीने का अधिकार है।”

दादी मास्टर की बात समझ गई। अपने क्रोध को शांत कर पोपली हँसी हस पड़ी रूक्मणी को भीतर जाने का इशारा कर दिया ।वह भी लजाती हुई भीतर कोठरी में चल दी ।होली के रंगों में उसे नया जीवन मिल गया था।

डॉ यास्मीन अली

हल्द्वानी ,नैनीताल उत्तराखंड।

What's Your Reaction?

like
0
dislike
0
love
1
funny
0
angry
0
sad
0
wow
0