ईश्वर अल्लाह तेरो नाम- Blog Post by Bhavna Thaker

ईश्वर अल्लाह तेरो नाम- Blog Post by Bhavna Thaker

"ईश्वर अल्लाह तेरो नाम सबको संमती दे भगवान"


आज बहुत सारी जगहों पर एक ही खबर देखी, पढ़ी और सुनी की नसीम रिज़वी ने सनातन धर्म अंगीकार कर लिया, और इस पर हर खबर के कमेन्ट बॉक्स में वसीम रिज़वी जी के बारे में उल्टी-सीधी कमेन्टस और दो धर्म के लोगों के बीच तू तू मैं मैं दिखी। इसमें इतनी खिंचातानी और बवाल क्यूँ?


महज़ बाप की गोद से उतर कर माँ के पहलू में ही तो आए है, वो भी अपनी मर्ज़ी से जबरदस्ती तो धर्म परिवर्तन करवाया नहीं गया।

वसीम रिज़वी जी से ये पूछे जाने पर कि उन्होंने इस्लाम धर्म क्यों छोड़ा, तब उन्होंने कहा कि \"मैंने इस्लाम धर्म को नहीं त्यागा बल्कि इस्लाम को मानने वाले लोगों ने मुझे इस्लाम से बाहर निकाल दिया है। मैंने जब राम मंदिर निर्माण की वकालत की तो उन्होंने मुझे इस्लाम से बाहर कर दिया। मैंने इस्लाम धर्म की बुराइयों को दूर करने की कोशिश की तो मेरे खिलाफ बोला गया। उन्होंने कहा कि जुम्मे की नमाज के बाद मेरे सिर पर इनाम बढ़ा दिया जाता था, इन सब वजहों से मैंने सनातन धर्म को स्वीकार किया है, क्योंकि सनातन धर्म इस दुनिया का सबसे पुराना धर्म है और इसे स्वीकार करने से पहले मैंने इसका अध्ययन किया था। सहज सी बात है उनको सनातन धर्म के प्रति आस्था जगी है तो उस द्वार से उस शक्ति की शरण में जाएंगे।


धर्म क्या है? भजन में तो हम गा देते है ईश्वर अल्लाह तेरो नाम, शक्ति एक ही है चाहे ईश्वर को भजो या अल्लाह को आख़िरकार एक ही चौखट पर आपकी दुआ जाती है।


धर्म से ही धुरी टिकी है फिर हर युग के दौर में धर्म खतरे में क्यूँ होता है? धर्म के नाम पर झगड़े, धर्म के नाम पर राजनीति और धर्म के नाम पर देश बंटता है। समझमें नहीं आता कि धर्मांधता ने इंसानी दिमाग की डोर थाम रखी है या हर युग में मूढ़ों के झुंड ही पैदा होते है। कब धर्मांधता की गिरह खुलेंगी, कब जंजीरे टूटेगी, कब समझ का सेतु रचेगा। एक ही पुल पर चलकर आवाम उम्र को आख़री अंजाम देते कब आगे बढ़ेगी। जल रही है ज़मीन, सिसक रहा आसमान धर्मांधता के शोले की लपटें कितनी तेज़ है। क्या उस शक्ति को इस षड्यंत्र का पता है? स्वरुप जिसके अनेक पर नाम एक है।


धर्म जितना इंसान को जानवर बनाता है उतना तो शायद दारू भी नहीं बनाती।धर्म का नशा पाक होना चाहिए नहीं की वहसियत भरा। जेहाद छेड़ो तो अपनेपन की,भाईचारे की। नफ़रत के बीज से नफ़रत ही पैदा होगी।

स्वामी विवेकानंद के अनुसार धर्म लोगों को संगठित करने का कार्य करता है और भाईचारे की भावना के साथ समाज को समग्र विकास के पथ पर अग्रेसर करता है। सामाजिक एकता को बढ़ाना विश्व के सभी धर्मों की स्थापना का मूल उद्देश्य है। महात्मा बुद्ध ने भी धर्मंम शरणं गच्छामि, संघम शरणं गच्छामि का संदेश दिया। अर्थात् उन्होंने धर्म के शरण में और इस प्रकार संघ के शरण में अर्थात संगठित होने का आह्वान किया जो कि ये संदेश आपसी एकता एवं भाईचारे को परिभाषित करता है।


चलो मान लिया आपको आपके आराध्य प्यारे है पर किसके सपने में आकर कहा की कत्ले-आम करो, लड़कीयों का जबरदस्ती धर्मं परिवर्तन करवा कर शादी करो, गाय की हत्या करो , धार्मिक त्यौहार पर एक जीव की हत्या करके उसे पकाकर आरोगना ये कहाँ का धर्मं कहलाता है। धर्मांधता की हद है, इंसान इंसान ना रह कर क्या बन जाता है।

दारु पी कर इंसान सच बोलता है, भावुक होता है, शांति से सो जाता है पर धर्म का नशा खूंखार है, उस नशे ने इंसान को कट्टरवादी बना दिया है इंसान में इंसान नहीं लोग मज़हब ढूँढने लगे है।


क्यूँ एक दूसरे को जानने, समझने की बजाय दुश्मन बने बैठे है। बहुत से हिन्दुओं को श्रद्धा पूर्वक दरगाह पर जाते है, तो बहुत से मुस्लिमों को सादर मंदिर में सर झुकाते हुए भी देखा है। ये धर्म के नाम पर अपना उल्लू सीधा करने वालों का एक समूह होता है जिनकी मानसिकता सिर्फ़ देश में अशांति फैलाने वाली होती है। बिना सोचे समझे धर्म को कूद पड़ते है हाथ में दिखावे की मशाल लेकर की हम रक्षक है धर्म के। कौन से ग्रंथ में ये सब लिखा है जो धर्म के नाम पर आज हो रहा है। हकिकत में इस धर्मं के चौले के पिछे भक्षक छुपे है इंसानियत के।

ईश्वरीय धर्म को हटाकर उसकी जगह पर विराजमान हो जाने वाले ‘नए क्रांतिकारी धर्म’ (सेक्युलरिज़्म) के मांधाता बैठ गए है इसके बड़े घोर दुष्परिणाम मानव-जाति को झेलने पड़ रहे है। उपद्रव, हिंसा, रक्तपात, शोषण, अन्याय, अत्याचार, व्यभिचार, नशाख़ोरी, शराबनोशी, अपराध, युद्ध, बलात्कार, नरसंहार, अभद्रता, अश्लीलता, यौन-अपराध, हत्या आदि का एक सैलाब बहता है धर्म के नाम पर। जिस पर बाँधा जाने वाला हर बाँध टूट जाता है।


हर एक इंसान की आँखों पर धर्मांधता की पट्टी पड़ी है क्यूँ आँखें सबकी बंद है यहाँ, क्यूँ दिमाग तक ही रहता है धर्म आचरण में नहीं उतरता। सियासती भाषा धर्म का विच्छेद करके मुस्कुरा देती है। जब ईश्वर अल्लाह एक है तब स्वरुप की इतनी चर्चा क्यूँ। सबका मालिक एक की परिभाषा ही नहीं बनी शायद। आज धर्मांधता के चूल्हे पर रोटियां शेकी जाती है, हिस्सों में बंट रहा मुल्क किसीको क्यूँ दिखता नहीं। हरा केसरिया शान से साथ-साथ तिरंगे की शोभा बढ़ा रहा है फिर इंसानी दिमाग में क्यूँ बैर है। मेरा भारत महान सिर्फ़ स्लोगन माना जाता है यहाँ, वोट बैंक की राजनीति के शिकार बनते दो कोम के लोग धर्म को समझे बिना लाठियां चला लेते है। इंसान की फितरत, ना समझी और मानसिकता पर एक ही चौखट पर बैठकर हंसते होंगे ईश्वर और अल्लाह।

देखते है ये धर्मांधता की आँधी ओर कितनी बर्बादी को न्यौता देती है।।


भावना ठाकर \"भावु\" (बेंगुलूरु, कर्नाटक)

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