इश्क नूर-ए-खुदा की नेमत है!

इश्क नूर-ए-खुदा की नेमत है!

"लगती है जब लगन दिल को एक चेहरे की कहाँ कोई ओर चेहरा भाता है, जवानी से झुर्रियों तक दिल को एक ही सनम सुहाता है"

है वही सच्चा इश्क जो बात-बात पर बदले ना, कितनी हो नोक झोंक पर भाव प्रीत के बदले ना। प्यार, इश्क मोहब्बत ये एहसास नूर-ए-खुदा की नेमत है, दो दिलों से बहती चाहत किसी खास दिन की मोहताज नहीं होती। ये आत्मिक भाव तो अपने साथी के प्रति निरंतर चीर काल बहता रहता है। प्यार उपहारों के तौर पर सबूत नहीं मांगता, जिनको रूहानी इश्क हो जाता है उसे महबूब की आँखों में झाँकते ही महसूस हो जाता है।

जब आप किसी को बेहद प्यार करते हैं तो उसका अहसास शब्दों में अभिव्यक्ति से परे होता है। यह प्यार झलकता है उस साथी के प्रति हमारे व्यवहार में। उसकी हर जरूरत को पूरा करने की हमारी चाहत में। वेलेंटाइन डे पश्चिमि सभ्यताओं का परिवेश है। हमारी सभ्यता और संस्कृति में किसी खास दिन पर इस तरह से प्यार जताना चोंचले समझे जाते है। भारत की भूमि पर राधा कृष्ण की सुंदर और बेनमून प्रेम कहानी ने जन्म लिया था जो आज भी आदर्श माना जाता है।

आजकल का प्यार चीन की पैदाइश जैसा लगता है, चार दिन ही टिकता है। आकर्षण को प्रेम का नाम देकर मजे लूटने को प्रेम कहती है आज की पीढ़ी। इस साल वैलेंटाइन वीक पर अपने महबूब पर उपहारों की बौछार करते इज़हार ए इश्क करने वालों का प्रेम छोटी सी बात पर ब्रेक अप होते अगला वैलेन्टाइन किसी ओर की बाँहों में कटता है। या तो फेसबुक पर चार दिन की हाय हैलो को प्यार समझते हल्की सी नोंक झोक पर ब्लाक मारकर रोने वाले इमोजी ड़ालकर ये जताते है मानों बरसों की चाहत ने मुँह मोड़ लिया हो। महज़ दिखावा और काम पूर्ति का साधन बनकर रह गई है मोहब्बत। पहले पार्क और गार्डनों में युवाओं का दैहिक और वासना युक्त प्रेम दिखाई देता था और अब यह अश्लीलता युवा मेट्रो और बसों में भी लेकर आ गए है। खुल्लम खुल्ला सरेआम गले में बाँहें ड़ाले चुम्बनों की आप ले प्यार नहीं, हवस पूर्ति और दिखावा है। प्यार मैं धैर्य, मर्यादा, लाज, शर्म और गरिमा का एक स्थान होता है, जो आजकल के प्यार से विलुप्त होता जा रहा है।

खुल्लम खुल्ला प्यार करेंगे और प्यार किया तो डरना क्या जैसे बेहूदा स्टेटस को आज के युवा अपनी शान समझते है। भारतीय युवा पीढ़ी पाश्चात्य सभ्यता की हवा में भारतीय समाज में प्रचलित प्रेम कथाओं को पूरी तरह भूल चुकी है।

सही में प्यार की परिभाषा ये है,

नज़र से नज़र मिलते ही दो दिलों में उठता प्रेम का पहला गुब्बार आख़री साँस तक एक ही महबूब के लिए उठे वही सच्चा प्यार होता है। शुरूआती

अंतहीन गुफ़्तगु से लेकर थोड़ी खामोशी तक कब मिलने आओगी से लेकर शाम को कब आओगे तक, हाए मेरी जान से लेकर अजी सुनते हो तक, हाट से खरीदे पहले गुलाब के फूल से लेकर धनिया पत्ती तक, महंगे उपहारों से लेकर राशन के थैलों तक और अभी न जाओ छोड़ कर के दिल अभी भरा नहीं से लेकर, आज बहुत काम था तक और लग्न वेदी की अग्नि से लेकर मणिकर्णिका की आख़री आँचल तक अपने साथी के लिए एक से स्पंदन दिल में पले उसे किसी वैलेन्टाइन डे की जरूरत नहीं होती। क्यूँकि इश्क कुछ ओर नहीं सात्विक भाव की चरम और शृंगारिक प्रीत है शाम की बेला में दाल रोटी के जुगाड़ की आस में तरसते दहलीज़ पर खड़े नैराश्य भाव की कब्र पर नैंनो में प्रेम का दिया जलाते

खाली हाथ लौटे पति के भाल को पत्नी का चुमना इश्क की आग है। सिलन भरी टपकती छत को निहारते लबों पर हंसी की बौछार लिए प्यार जताते कहना देखो ना ये शीत सी रिमझिम, मेरे थके तप्त तन पर कभी तुम भी यूँ बरसो ना इश्क बारिश ही तो है। आटे का खाली डिब्बा पकड़ाते पति को बजाइये ना बोल कर चंद लम्हें डिब्बे की तान पर पैरों को नृत्य की नवाजिश देना भी तो इश्क की रंगीनियों का ही एक रंग है। खाली जेब को टटोल रहे पति के हाथों में साड़ी की गड़ी के नीचे से निकाली, टूटने की कगार पर खड़ी सौ रुपये की नोट चुपके से थमा देना इन्तहां ही तो है इश्क की। ज़िंदगी की आपाधापी से निढ़ाल एक दूसरे को आँखों से "क्या तुम भी, मैं हूँ ना" जताना परिभाषा ही तो है इश्क की। कहो ऐसे इश्क को क्या जरूरत किसी वैलेन्टाइन डे की।

भावना ठाकर \"भावु\" (बेंगलोर, कर्नाटक)

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