"जो अपने लिए खराब, वो कामवाली के लिए अच्छा कैसे?"

"जो अपने लिए खराब, वो कामवाली के लिए अच्छा कैसे?"

"कमला, देख यह आलू मटर की सब्जी और पुलाव है, काम खत्म हो जाने के बाद ले जाना भूलना नहीं।", रागिनी ने कहा

"जी मेमसाब, आज तो बच्चों की दावत हो जाएगी।", कमला ने खुश होकर कहा घर जाते वक्त वह बचा खाना ले गई। उसके बच्चों ने मजे लेकर खाना खाया। ऐसा अक्सर होता था, रागिनी के घर से कमला को बचा हुआ खाना-मिठाई मिल जाता था, वह घर ले जाती।


रागिनी ख्याल रखती कि कमला को वहीं खाने पीने का सामान दे जो स्वयं के खाने लायक हो।रागिनी अपने पति समर के साथ इस महानगर में रहती है , बेटी साक्षी सात साल की है। रागिनी के सास-ससुर दूसरे शहर में रहते हैं। वे लोग छुट्टियां पड़ते ही अपने घर जाया करते हैं। नन्हीं साक्षी भी बाबा-दादी के पास जाकर खुश हो जाती।


रागिनी के सातवां महीना चल रहा है तो सास-ससुर रहने आ गए हैं। रागिनी के एक ही भाई है जो विदेश में बस गया और उसकी माता जी भी अपने बेटे-बहू के साथ विदेश में रहती हैं।रागिनी की सास गीता जी थोड़ी कड़क मिजाज औरत हैं पर बहू की फ़िक्र करती हैं। रागिनी ने खाना बनाने के लिए कामवाली रख ली ताकि सासुमाॅ॑ पर अधिक काम का बोझ न पड़े। वैसे भी उससे जितना होता वो करवाने की कोशिश करती।


आठवें महीने से थोड़ी तकलीफ़ बढ़ने के कारण डाॅक्टर ने‌ रागिनी को बेड-रेस्ट बता दिया तो रागिनी का किचन में जाना कम होने लगा , अपना ही काम बमुश्किल कर पाती। ऐसे में एक दिन साक्षी और गीता जी रसोई में थी , गीता जी साक्षी को दूध दे रही थीं, कमला काम खत्म कर अपने घर जाने की तैयारी में थी।


गीता जी ने कमला से कहा," कमला कुछ सब्जी और मिठाई बची है , तुम घर ले जाना।"कमला को उन्होंने मिठाई और बची सब्जी दी।साक्षी देख कर बोली , "पर दादी यह तो कई..."बीच में ही गीता जी ने टोककर कमला से कहा , " तुम जाओ अब" कमला चली गई, साक्षी ने दादी से कहा," दादी, यह सब्जी तो कई दिन पहले बनी थी और यह मिठाई तो सोनी आंटी लाई थी जब वो दो संडे पहले आईं थीं। "


दादी बोली," हां, तो क्या हुआ? मिठाई बारह-पन्द्रह दिन पुरानी है और सब्जी चार दिन। यह लोग खा लेते हैं। साक्षी बोली," दादी फिर तो हम भी खा सकते थे आपने कमला आंटी को क्यों दी?"


"अरे बेटा हम थोड़ी इतनी पुरानी खाते, हमारा पेट खराब हो जाएगा। इन‌ लोगों का क्या है, सब हजम कर लेते हैं। ये तो पत्थर भी पचा जाएं।"


"दादी, हमें कमला आंटी को वहीं चीजें खाने को देनी चाहिए जिन्हें हम खुद खा सकें। जो हम नहीं खा सकते उसे नहीं देना चाहिए। उनके भी छोटे बच्चे हैं वो खुद भी और उनके बच्चे भी इतनी पुरानी चीजें खाकर बीमार पड़ सकते हैं।"

इतनी आवाजें सुनकर रागिनी भी धीरे-धीरे उठकर रसोई के दरवाजे तक आ गई थी।


वह भी बोली," मम्मी जी, साक्षी सही कह रही है, बासी पुरानी चीजें खाकर कोई भी बीमार पड़ सकता है।"गीता जी बोली," अरे! अब तुम भी साक्षी की हां में हां मिला रही हो।"


"मम्मी जी , कमला दूर नहीं गई होगी , मैं फोन कर वापस बुला लेती हूॅ॑।"

"ठीक है, जैसी मर्जी.."


कमला को बुला कर रागिनी ने उसे बोला कि मम्मी जी ने गलती से हटाने वाली सब्जी और मिठाई तुम्हें दे दी, यह फ्रिज में पीछे रखी रह गई और अब काफी पुरानी हो गई है।

कमला चली गई यह कहकर कि आप तो कभी खराब चीज नहीं देती हों, माताजी को भी पता नहीं था नहीं तो वो भी नहीं देतीं।


साथ में कमला यह भी बोली कि सामने वाले फ्लैट में जो नये लोग आए हैं , उनके दिए खराब खाने से उसके छोटे बच्चे को दस्त लग गए थे और पेट दुख गया था,‍‍ तब से वह उनका दिया सामान मना कर देती है।

गीता जी पर इस समय तक घड़ों पानी पड़ चुका था, उनकी पोती साक्षी ने उन्हें अनजाने में‌ ही सभी को समान समझने, चाहें वो काम वाले क्यों न हों और जो भोजन खुद खा सकें वो ही कामवालों को देने की सीख दे दी।


दोस्तों, बच्चे छोटी से छोटी बात को ध्यान से देखते हैं। आशा है, आपको एक बच्ची के द्वारा दी सीख को दर्शाती मेरी यह कहानी अच्छी लगी होगी। कृपया लाइक, कमेंट और शेयर कीजिएगा। आपकी प्रतिक्रिया का इंतजार रहेगा।



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धन्यवाद।


-प्रियंका सक्सेना


(मौलिक व स्वरचित)

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