जब डर की जगह प्यार ने ली

जब डर की जगह प्यार ने ली

चावल से भरे कलश को गिरा कर मैंने ससुराल में मंगल प्रवेश किया ।थोड़ी देर बाद रस्मों का सिलसिला शुरू हुआ ।चेहरेपर मुस्कान तो मैंने ओढ़ ली थी पर मन ....मन तो डरे सहमे विचारों से भरा हुआ था ।शादी से पहले सहेलियों के बीच,आस-पास के क़िस्सों से जो सास -ननद की छवि ,ससुराल गेंदा फूल जैसी बातें मेरे मन में बसी थी वो मुझे परेशान कररही थी ।वैसे भी अक्सर मैंने रोहन के मुँह से सुना था कीमाँ बेहद अनुशासन प्रिय और कड़क हैं उसकी बताई माँबाक़ी सारी बातों को दर -किनारे कर मेरे मन में अनुशासन और कड़क शब्द मन में गहराई से समा गया ।मेरे सामने अब वोफ़िल्मों वाली शशिकला ,ललिता पवार जैसी सासें और बिंदु रीटा भादुड़ी जैसी नंदों की छवि उभर रही थी ,जिसमें अक्सरननद अपनी माँ को अपनी भाभी के ख़िलाफ़ भड़काती है और फिर सास अपनी बहू को तानों की बौछार करती है

धीरे धीरे वक़्त के साथ मैं ससुराल में ऐडजस्ट होने लगी पर मेरा डर अभी भी क़ायम था ।शायद उसकी वजह मेरी सासु माँका रौबदार ,कड़क अनुशाषित व्यक्तित्व और मेरी ननद का हमेशा उनसे चिपके रहना था ।मुझे लगता की ज़रूर शालू दीमम्मी को मेरे ख़िलाफ़ भड़का रहीं है

मेरा डरा सहमा चेहरा देख अकसर माँ जी बड़े प्यार से पूछतीक्या बात है बेटा ? तुम ख़ुश नहीं हो ...कोई तकलीफ़ हो तोबताओ ?” और मैं हमेशानहीं मम्मी मैं ख़ुश हूँकह कर टाल

देती ।उनके प्यार भरे बोल भी मेरा डर कम नहीं कर पा रहे थे ।ससुराल में मैंने मम्मी जी का प्यार भरा रूप देखा और ननदशालू का हमेशा एक सहेली जैसा व्यवहार देखा ,पर मैं अपने वो ससुराल गेंदा फूल टाइप वाले विचारों से छुट्टी नहीं पा रहीथी

एक दिन मुझे बहुत तेज़ बुखार गया ।बहुत दवाई देने के बाद भी वो कम नहीं हो रहा था ।मुझपर बेहोशी सी छाने लगीऔर मैं अपनी माँ को याद करने लगी ।तभी एक ममता भरा स्पर्श का मुझे मेरे माथे पर एहसास हुआ

मम्मी जी और शालू दी ने मेरी सेवा में कोई कसर नहीं छोड़ी ।रात भर जाग कर उन्होंने मेरे माथे पर ठंडी पट्टियाँ रखी ,औरशालू दी हर थोड़ी देर में मुझे थोड़ा थोड़ा निम्बू पानी पिलाती ताकि मेरे अंदर पानी की कमी हो जाए ।सुबह दवाई केअसर ....नहीं नही एक माँ की ममता और एक बहन के प्यार से मेरा बुखार जब कुछ कम हुआ तो भी मम्मी जी मेरे सिरहानेबैठी थीं मुझसे पूछने लगी

बेटा अब कैसी तबीयत है ?”

अब ठीक हूँ मम्मी ,थैंक यूँकह कर मैं रोने

लगी

तब उन्होंने मुझे बड़े प्यार से समझाया ,” बेटा माँ को कभी भी थैंक यूँ नहीं कहते जब लड़की शादी करके ससुराल आतीहै तो तरह तरह के ख़याल और डर उसे जकड़े होते हैं ख़ास तौर पर एक सास का डर ,जो की स्वाभाविक है ।सब नयीबहुओं की यही कहानी होती है ,मेरी भी थी ।एक बहू एक कच्ची मिट्टी के समान होती है जिसे एक सास तराश कर एकख़ूबसूरत घड़े का रूप देती है ताकि वो भविष्य में अपना घर सँवार सकें ।घर को एक डोर में बाँधने के लिए कभी कभीकड़क और अनुशाषित होना पड़ता है ।किंतु इसका मतलब ये बिलकुल नहीं है कि ससुराल एक पिंजरा है ।ख़ूब ख़ुश रहो,घूमों फिरो किंतु रात बारह बजे तक घर जाओ ,ये अनुशासन है ।मेरे लिए तो जैसी शालू है वैसी ही तुम हो ।ये घरजितना मेरा है उतना ही तुम्हारा है ।अभी तक मैं अकेले ही इसे प्यार से सींचती थी पर अब मुझे तुम्हारा साथ चाहिए....बोलो बेटा दोगी ना मेरा साथ ? “ कह कर वो मुझे देखने लगी और मैं ...मैं तो मंत्र मुग्ध सी उनकी बातें सुन रही थी ।मुझेपता ही नहीं चला की कब मेरे दिल में उस डर की जगह अब प्यार ने ली थी ।और मैं उनके गले लग गयी

-कीर्ति जैन

#The pink Comrade 

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