जब खुद से कहो-मैं हूँ ना

जब खुद से कहो-मैं हूँ ना

हमारे समाज में लड़कियों को जिस दायरे में रहना सिखाया जाता है कभी-कभी उनकी पर्सनलिटी दब जाती है , बहुत सी क्वालिटीज़ होने के बावजूद वह वो सब हासिल नहीं कर पातीं जितना वो डिसर्व करती हैं। वैसे पिछले दो दशकों में लोगों की सोच और लड़कियों के स्वातंत्र्य के नज़रिये में बदलाव ज़रूर आया है ।बेशक अपने भविष्य के फैसले, कैरियर का चुनाव अब लड़कियां स्वेच्छा से करने लगी हैं और यही शायद समय की दरकार भी है।

1990 के दशक में जब हम स्टूडेंट ही थे और यही हमारे कैरियर बनाने की उम्र भी थी अपनी सहपाठियों से बातचीत होती तो, बतातीं कि मम्मी- पापा के उन्हें लेकर क्या-क्या सपने  हैं लाज़मी भी था, हर माँ- बाप बच्चों में अपने सपने साकार होते देखना चाहते हैं, मगर अच्छा रिश्ता आया नहीं और पढ़ाई को  यह कहकर कि आगे ससुराल में पढ़ लेगी ब्रेक लगा कई लड़कियों की शादी होते मैंने देखा,मगर कुछ ऐसी भी थीं जिन्होंने कैरियर को प्राथमिकता दी और पूरी लगन के साथ डटी रहीं अपनी मंज़िल को पाने में। 
           

मैं भी उसी पक्के इरादे वाली टोली का हिस्सा हूँ , जो हमेशा ही अपने फैंसले ख़ुद लेने वाली रही, इस जगह पर मैं खुद  को सौभाग्यशाली ही कहूँगी  कि मेरे पेरेंट्स बहुत सपोर्टिंग रहे  उन्होंने  अपनी पसंद- नापसंद से परे हमारी इच्छानुरूप अपने कैरियर संबंधी फैसले लेने दिए, और शायद यही वजह है कि आज हर अच्छे- बुरे का बाआसानी अंदाज़ा हो जाता है, एक लगन, जज़्बा आगे बढ़ाता रहा , जुनून इतना कि हर इम्तेहान में सफलता मिले , शुक्र उस खुदा का जिसने हमेशा हर जगह कामयाबी भी दिलाई, इससे ज्यादा और क्या कहूँ कि मैंने रिअल लाइफ़ में आधे घंटे भी बेरोजगारी नहीं देखी ।

1992 में मुझे एक कंपनी में जे.ई .की नौकरी मिल चुकी थी, पर मैंने अपनी पढ़ाई को आगे कन्टीन्यू  रखा और  साथ ही आकाशवाणी केन्द्र में केज़ुअल कंपेयर/एनाउंसर के तौर पर काम किया, कुछ सालों बाद  सरकारी नौकरी मिल गई, उसे ज्वाइन करने के बाद भी आगे पढ़ाई जारी रखी । अब तक रिश्ते बहुत थे और शादी की उम्र भी हो चुकी थी, पर मैंने यह कह कर मना कर दिया कि पी.एच. डी एवार्ड होने के बाद ही,  फिर पी -एच- डी भी हासिल हो गईं, नौकरी  तो थी ही और अब रिश्ता फाइनल करना था, अमूमन उन दिनों यह ज़रूरी नहीं समझा जाता था कि लड़के -लड़की की बात हो, मगर यहाँ भी मैंने कह दिया कि मुझे रिश्ता फाइनल करने से पहले लड़के से बात कराना ,मैं चाहती  ही थी कि आखिर जिसके साथ पूरी ज़िंदगी गुज़ारनी है उसे कुछ तो समझा जाए, इस तरह एक बार फिर अपने जीवन की निर्णायिका और नायिका होने का अहसास किया ।

अब शादी के बाद ससुराल आई, यहाँ पति का पूरा सपोर्ट मिला उन्होंने भी मेरे किसी फैसले पर अपनी मर्ज़ी नहीं चलाई, मुझे खुशी है कि मेरे जीवन में जब कभी मुझसे संबंधित कोई फैसला लेने का अवसर आया मुझे हमेशा अपना चुनाव करने का मौक़ा मिला और मैंने महसूस किया कि मैं अपने जीवन की नायिका खुद ही हूँ तो फिर फैसला भी मेरा होना चाहिए ।  फिर अपने लिए खुद से बेहतर भला कौन समझ सकता है, ज़रूरत  होती है तो बस इतनी कि सही वक्त पर सही फैसला लिया जाए ।। 
 

मौलिक
 डॉ यास्मीन अली
 हल्द्वानी,  उत्तराखंड। 
           

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