जिम्मेदारी

जिम्मेदारी

अरे अरे ये क्या बेटा तुम्हारे तो सारे कपड़े ख़राब हो गए...चलो कोई बात नहीं गंदे कपड़े खोल कर रख दो और दूसरे कपड़े पहन लो।


रति ने बेटी काजल से कहा और बेटी के कपड़े बदलवाने उसके पीछे पीछे चल देती है। मां बेटी की बात सुनकर  रति की सास मन ही मन बुदबुदाने लगी...


हूं कुछ ज्यादा ही सर चढ़ाकर रखा है लड़की जात को, हमारे जमाने में इस उम्र की लड़कियां अपनी गृहस्थी संभालने लगती थी और एक ये हैं हमारी पोती जो अभी तक मां का आंचल थामें चलना सिख रही हैं।एक तो मुझे पोते का मुंह नहीं दिखा पाई और बेटी पर ऐसे गुमान करती है जैसे वो कोई बेटा हो।


रति की कान में सास की बुदबुदाने की आवाज़ मद्धम मद्धम सुनाई दे रही थी या यूं कहें तो वो सास की बात सुनना चाह रही थी।


रति को तो आदत सी हो गई थी इन तानों की पर वो कोशिश करती कि उनकी बातें बेटी काजल के कानों में ना पड़े।इसी साल तो तेरह साल की हुई है बेटी, उम्र के इस पड़ाव में बच्चे इतने उत्साहित रहते हैं कि उन्हें हर काम की जल्दबाजी मची रहती है। उनके जिज्ञासु मन में भी तरह-तरह के सवाल उमड़ते-घुमड़ते रहते हैं और वे उस सवाल का जवाब ढूंढने में जी जान लगा देते हैं।


बचपन से ही काजल ने दादी की अवहेलना को झेला था। पहले वो बच्ची नहीं समझती थी पर वो जैसे जैसे बड़ी हो रही है दादी का झिड़कन को समझने की कोशिश करती।


बच्ची दादी दादी करती आगे पीछे घुमती और दादी मुंह बनाकर बच्ची को डांटती रहती। रति से ये सब बर्दाश्त नहीं होता और वो हमेशा दादी पोती के बीच एक ढाल बनकर खड़ी हो जाती। रति हमेशा कोशिश करती की सास कुछ ऐसा वैसा बोलकर काजल के बाल मन से ना खेलें।


रति जब काजल के कपड़े बदलवा वापस आई तो सास का फूला हुआ मुंह देखकर समझ गई कि आज फिर घर में किच-किच होगी‌ और वैसा ही हुआ।


बहू अब तेरी बेटी बड़ी हो रही है उसे जरा ठीक से उठना बैठना सिखा,ये खेलना कूदना बंद कर के उसे घर के कामकाज सिखा वरना शादी के बाद तुझे ही ताने सुनने को मिलेंगे। इस उम्र की लड़कियों पर थोड़ी बहुत "जिम्मेदारी" सौंप ही देनी चाहिए।


रति से अब सुना नहीं गया तो उसने कहा हां मां जी आप चिंता मत करिए, समय आने पर मैं अपनी बेटी को सब-कुछ सिखा दूंगी और गृहस्थी कैसे संभालनी है वो भी बता दूंगी। पढ़ने लिखने ,खाने , खेलने की उम्र में मैं घर गृहस्थी का ज्ञान अपनी बेटी को नहीं देना चाहती।

बेटियां जब तक मायके में होती हैं तभी तक अपने मन का कर पाती हैं , जिम्मेदारी उठाने के बाद लड़कियां अपनी नहीं दूसरों की चिंता ज्यादा करती है। 

और क्या मां जी जिम्मेदारी संभालना रीति-रिवाज का पालन करना केवल लड़कियों का काम है? यदि हां तो मैं इन सब दकियानूसी बंधनों से अपनी बेटी को नहीं बांधना चाहती....



रति की बात सुनकर उसकी बातों को अनदेखा कर वो बुदबुदाते हुए टीवी खोलकर प्रवचन सुनने लगी। पर सास को दो टूक सुनाकर रति का मन शांत हो गया था।


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