जूता चुराई का रस्म बना अहम का मुद्दा #wedding_blog

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बात तकरीबन दस साल पहले की है, दूर के रिश्ते की बहन कि शादी थी।बहन की शादी होने के कारण हम सभी भाई बहन और रिश्तेदार मित्र जो युवावर्ग से संबद्घ रखते थे कुछ ज्यादा ही उत्साहित थे।बारातियों के स्वागत सत्कार का जिम्मा भी हम सबके ऊपर ही था मगर उन्हें कैसे परेशान कर मजे लेना है इसके लिए रोज नई नई योजनाएं बनाई जा रही थी।यह परेशान करना सिर्फ हँसी मजाक के लिए था किसी को अपमानित करने की न कोई मंसा थी और न ही हमारे संस्कार में ही ऐसा था।


बारात में दो महिलाएं आई थी एक लड़के की बड़ी बहन थी और एक दूर की रिश्तेदार एक बुजुर्ग महिला थी।जो बुजुर्ग महिला थी वह शांत सौम्य थी और उन्हें शादी देखने और आनंद उठाने के अलावा किसी दूसरे कार्य में कोई दिलचस्पी नही थी।

परंतु लड़के की बहन अकड़ में थी और वह अकड़ थी लड़के वाले होने का ,लड़के की बहन होने का।


गंभीर मुद्रा में दिखती जान पड़ती थी मानो मुस्कान को घर पर ही छोड़ आई हो और मुस्कुरा दिया तो कही टैक्स न लग जाये।मेरे रिश्तेदार के घर वाले खासकर लड़की की माँ बहन चाचा उनकी खातिरदारी में लगे हुए थे कि कही ऐसा न हो कि खातिर में चूक हो जाये और दूल्हे की बहन नाराज हो जाये।और इधर हम सभी युवावर्ग उनके रवैये से कुढ़ रहे थे कि कैसे उन्हें सबक सिखाई जाय।ताकि उनकी अकड़ कम हो।

बात जूते चुराई की रस्म की आई वह पहले ही दूल्हे के जूते लेकर पैरों में डालकर बैठ गईं अब तक हम सबको जिद हो गयी जूते लेना ही हैं।

लड़कों ने ताना मारा आजकल लड़के के जूते साड़ी पर पहनने का फैशन है मगर वह चिकना घड़ा कोई असर नही।तभी किसी काम से उन्हें जाना हुआ वह साथ वाली महिला के जिम्मे जूते सौंप गयी और उनके जाते ही हमारे अनुरोध पर उस महिला ने जूते दे दिए।आने पर जूते नदारद देख वह गुस्सा होकर मंडप से ही चली गईं।


हँसते खिलखिलाते माहौल को बोझल बनाकर।

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