जीत परवरिश की -Story By Aparna Jaiswal

दीपिका एक नामी वकील जिसका मकसद मजलूम औरतों को इंसाफ दिलाना... आज उससे मिलने बरसों बाद रजनीश जी पहुंचते है। उसे अपने ऑफिस में देख दीपिका हैरान रह जाती हैं और बरसों पुराना दर्द याद आते ही उसकी आंखों में नफरत भर जाती है।"

आज बरसों बाद इन्हें मेरी याद कैसे आ गयी" इसी उधेड़बुन में दीपिका थी कि उसकी असिस्टेंट ने कहा कि मिस्टर रजनीश जी आपसे मिलना चाहते है। पहले दीपिका का मन किया कि मना कर दूं, लेकिन फिर सोचा कि पता तो चले कि यहां आने का मकसद क्या है। इसलिए वो असिस्टेंट को हां कह देती है।

रजनीश जी जैसे ही केबिन में आते है, दीपिका थोड़ी तल्ख आवाज में पूछती है, "कहिये, आपको क्या कहना है और अचानक आपको इतने सालों बाद मेरी याद कैसे आ गयी?"

"बेटा, कैसी हो? "

"मेरा हालचाल तो आप पूछने नहीं आये है, मुद्दे पर आइए और एक बात अच्छे से गांठ बांध लीजिए... मैं सिर्फ अपनी मम्मा की बेटा हूं। बेहतर होगा कि आप मुझे मेरे नाम से बुलाए"

"ठीक है, मेरे बेटे के ऊपर एक केस चल रहा है। मैं चाहता हूं कि तुम मेरे बेटे को छुड़वा दो"

"केस !!! क्या आरोप है?"

"रचना नाम की लड़की उसी के कॉलेज में पढ़ती है उसने उसके ऊपर छेड़छाड़ का झूठा आरोप लगाया है और वह केस तुम्हारे पास है इसलिये कोई दूसरा वकील मेरे बेटे का केस लड़ने को तैयार नहीं है"

"कमाल के आप और आपका बेटा... सही ही कहा गया है कि जैसी फसल बोओगे वैसा ही पैदावार मिलेगा। जब बीज ही सड़ा हो तो फसल में कीड़े लगेंगे ही। जैसे आपने कभी औरतों के जज्बातों की कद्र नहीं की, वैसे ही आपका बेटा औरतों की इज्जत नहीं करता। आपने सही सुना... रचना का केस मैं ही लड़ रही हूं और मैं पूरी कोशिश करूंगी कि गुनहगार को सख्त सजा मिलें।"

"यह मत भूलों दीपिका कि जिस पोस्ट पर तुम आज बैठी हो, उस जगह तुम मेरे दिये हुए पैसों से ही पहुंची हो वरना... तुम और तुम्हारी मां कही सड़क पर भीख मांग रहे होते"

"अगर आपके पैसों की वजह से मैनें यह मुकाम हासिल किया है तो आपके ही पैसों से आपका बेटा योग्य क्यों नहीं बन गया। उसने अपना मुकाम जेल को क्यों बना लिया। उसी पैसों से थोड़ा संस्कार भी खरीद लिया होता। यह मेरी मां के अनमोल संस्कार, उनकी तपस्या और परवरिश का नतीजा है, जो मैं इस योग्य बन पायी कि आप और आप के बेटे जैसे लोगों के खिलाफ में जंग लड़ सकूं"

रजनीश जी अब कुछ न बोल सके... उन्होनें अपनी पत्नी बरखा को सिर्फ इसलिये छोड़ दिया क्योंकि वह उन्हें घर का वारिस नहीं दे पायी। तब दीपिका आठ साल की थी। दीपिका के पैदा होने के समय बरखा को कुछ कोम्प्लीकेशन हो गया था जिसकी वजह से वह दुबारा मां नहीं बन पायी। बेटे की चाह में रजनीश जी ने अपने ऑफिस की एक सहकर्मी से रिश्ता बना लिया और एक दिन रजनीश जी ने तलाक के पेपर बरखा के सामने रख दिया।

बरखा ने दीपिका की तरफ देखा और एक निर्णय ले लिया," ठीक है रजनीश, अब आप से कोर्ट में मुलाकात होगी"कोर्ट में केस चला और बरखा ने रजनीश को तलाक़ दे दिया किन्तु इस शर्त के साथ कि दीपिका की पढ़ाई का खर्च रजनीश उठायेगा।

"अब आप जा सकते हैं और याद रखिएगा मेरा नाम दीपिका बरखा है और मेरा आपसे कोई रिश्ता नहीं है। जल्द ही फिर मिलेंगे कोर्ट में" दीपिका ने हाथ जोड़कर रजनीश को बाहर का रास्ता दिखा दिया।

रजनीश जी अब आगे कुछ नहीं बोल सके... बरसों पहले एक गलत फैसला लिया था जिसका परिणाम उनके सामने था और अब उनके पास पछ्तावे के सिवा कुछ नहीं था।

रजनीश के जाने के बाद न जाने क्यों आज दीपिका को ऐसा लगा कि उसकी मां बरखा की परवरिश जीत गयी... एक बेटी की मां जीत गयी।


अर्पणा जायसवाल

#बेटी

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