जूठन! #BreakTheBias

जूठन! #BreakTheBias

भले ससुराल शहर में बस गया था पर जड़ें तो अभी भी गांव से जुड़ी थी। शादी के बाद मैं भी बैलगाड़ी की अविस्मरणीय सफर कर गांव पहुंची ।जैसे उन दिनों होता था घर की स्त्रियां, बहुएं घर की चारदीवारी में रहती थी। दिन भर गांव की स्त्रियों का तांता लगा रहा मुझ जैसे शहर में पली-बढ़ी अजूबा को देखने।


पुरुषों के भोजन के बाद ही स्त्रियां भोजन करती थी। वह भी उसी थाली में जिसमें पति ने भोजन किया था। प्रसाद के तौर पर कुछ जूठन थाली में छोड़ देते थे। सिर माथे लगा पत्नी उसे खुशी-खुशी ग्रहण करती थी।


किसी की जूठी थाली में खाना, मेरी कल्पना से परे था । मेरी सास, जेठानी, ननंद और कुछ गांव की महिलाएं सभी पतियों की जूठी थाली के सामने बैठ गई। मुझे भी पति की झूठी थाली में परोसा। मुझे तो थाली में तितर-बितर जूठन देखी उबकाई आने लगी।

दीदी, मैंने जेठानी से कहा," मैं जूठी थाली में नहीं खाऊंगी!" सभी स्त्रियां एक साथ बोल पड़ी," यह तो पति का प्रसाद है। बरसों से हम यूं ही खाते आए हैं"।


मैं कुछ ना बोली।

जेठानी उस जूठन को दूसरी साफ थाली में परोस कर ले आई। सभी मेरे चेहरे को ही घूर रहे थे मानों कह रहे हों "शहरी लड़कियों के नखरे बहुत हैं"।


मैं फिर रुवांसी होकर बोली," नहीं दीदी, मैं जूठन नहीं खाऊंगी। आप मुझे फ्रेश खाना साफ थाली में परोस दे।

कुछ महिलाएं मेरी इस बात पर खी खी कर हंस पड़ी। मैंने खुद को अपमानित महसूस किया। पर ऐसी प्रथा के विरुद्ध कदम तो उठाना ही था। आज नहीं उठाऊंगी तो फिर कभी नहीं उठा पाऊंगी। अपना दृढ़ निश्चय सुना दिया।

थोड़ी देर में जेठानी ने नई थाली में फ्रेश खाना परोस मुझे दिया।


आश्चर्य की बात, पति को भगवान का दर्जा दे उसके जूठन को प्रसाद का दर्जा दे दिया जाता है भले ही वह पति शराब पी पत्नी को मारता पीटता ही क्यों ना हो?

गलत रस्मो रिवाज के खिलाफ आवाज तो उठाना ही चाहिए ?


#BREAK THE BIAS

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