जीने का अनोखा ढंग

जीने का अनोखा ढंग

शीना आज बहुत खुश थी। दादी के गाँव जाना उसे बेहद अच्छा लगता था । बचपन में तो अक्सर जाती रहती थी वहाँ,  पर अब जब से जिम्मेदारियों का बोझ काँधे पर आया है कभी कभार ही जा पाती है। 

गांव में पहुँचने में कुछ मिनट का सफ़र ही बाकी था । शीना खिड़की से बाहर देखते हुए गाँव को याद करते हुए मुस्कुराती जा रही थी । शीना पूरे गाँव में घूमती रहती थी कभी इस घर और कभी उस घर ,कभी दादी के साथ तो कभी दादू के साथ । सबकी लाडली जो थी वह।

तभी मैडम जी …..लो , आ गया आपका गाँव……। बोलिए किस तरफ जाना है …..ड्राइवर की आवाज़ सुनाई दी ।

वाह ! पहुँच गए …….दाईं ओर ले चलिए भैया ।

शीना सोच रही थी कि दादा-दादी उसे अचानक देखकर बहुत ही खुश हो जाएँगे और इसीलिए वह इस बार जानबूझकर बिना बताए आई थी । तभी …….बस, बस …..भैया …..रोको तो …..दादी का घर आ गया ।

शीना ने गाड़ी से नीचे जैसे ही पाँव रखा , उसे एक अजीब खुशी का अनुभव हुआ, जैसे उसका सर्वस्व यहीं बसता हो और था भी ऐसा ही । बिना आवाज़ दिए वह दरवाजे के अंदर पहुँच गई । वह सोच रही थी कि दादू कहीं बैठें मिलेंगे तो वह झट से उनकी आँखें बंद करके पूछेगी कि बोलो- कौन ।कमरे के अंदर से खूब हँसने-खिलखिलाने की आवाज़ें आ रही थी ।उसने सोचा कि शायद कोई आयोजन चल रहा होगा पर आयोजन भी बिना बताए नहीं होगा ।

यह सोचते-सोचते वह कमरे के अंदर घुस गई ।एक पल के लिए सब शांत हो गया और जैसे ही दादू पलटे तो ज़ोर से बोले – शीनू , तू  बिना बताए ही आ गई….. मेरी बेटी। बता कर आती तो हम सब तेरे शानदार स्वागत की तैयारी रखते । सारा घर शीनू- शीनू की , हँसी खुशी की आवाजों से महक गया ।तभी दादी ने भागकर – आकर मुझे गले से लगा लिया। फिर मैं भी इस भावनापूर्ण माहौल में खुद को थोड़ा सँभालते हुए बोली – क्या कोई आयोजन चल रहा है, दादू ? 

अरी बिटिया , यह तो हर रोज़ का ही आयोजन है । हम सबने अपने – अपने बच्चों को एक ऊँची उड़ान भरने के लिए छोड़ दिया है । सब ने अपने – अपने घोंसले अपनी मरज़ी मुताबिक बना लिए हैं । सब खुश हैं अपने-अपने आशियां और जीवन में ।

हमने भी अपना जीने का ढंग बना रखा है हम रोज़ शाम 2 घंटे के लिए एक दूसरे के घर में मिलते हैं , आज सब मेरे यहाँ, कल शर्मा जी के यहाँ और परसों किसी और के यहाँ । इस तरह से हर रोज़ किसी ना किसी के यहाँ हम अपनी अकेलापन भगाने की महफिल जमाते हैं।इस तरह से हमें  जीवन में कभी अकेलापन नहीं लगता ।

वाह दादू , यह तो बहुत अच्छा है । दादू का यह जीवन जीने का ढंग जीवन और उनका सकारात्मक दृष्टिकोण मुझे बहुत पसंद आया ।

सच ,गाँव में अकेले होते हुए भी मुझे वहाँ प्यार , व्यवहार व अपनापन सब खूब नज़र आया और शहर की चकाचौंध  भरी भीड़ में होते हुए भी हम अकेला महसूस करते हैं ।

अरे ….कहाँ खो गई बिटिया?….. तभी दादी की आवाज़ आई।कहीं नहीं दादी, कहकर मैं सब के साथ उनकी हँसी में शामिल हो गई और मिल गया मुझे भी एक बेहद खूबसूरत और यादगार लम्हा जिसमें सिर्फ प्यार ही प्यार और खुशी ही खुशी नज़र आ रही थी ।

इस कहानी के माध्यम से मैं बताना चाहती हूँ कि हम अकेलेपन में भी अपने व्यवहार से ख़ुशियाँ ढूँढ सकते हैं , खुशी से रह सकते हैं  ।

धन्यवाद 

मधु धीमान

कैथल (हरियाणा)

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