जीवन के रंग

जीवन के रंग

सम्मान पाना किसे अच्छा नहीं लगता मुझे भी कई अवार्ड मिले हैं जिनसे सम्बंधित तस्वीरों और वस्तुओं को देखकर आज भी बहुत खुशी होती है लेकिन एक सम्मान ऐसा है जिसे मैंने कहाँ सहेजकर रखा है मुझे भी याद नहीं है...'मानवता सम्मान'   इस शीर्षक के साथ आपको कोई सम्मान मिले और आप खुश न हो पायें सोचिये कैसी मनःस्थिति होगी ...

आज में आपके साथ अपनी जिंदगी का वो पन्ना साझा कर रही हूँ जिसको याद करके आज भी मैं विचलित हो जाती हूँ मैं जिस कम्पनी में काम करती थी उसकी एक यूनिट में काँट्रेक्ट पर काम करवाया जा रहा था जिसकी जिम्मेदारी मुझे दी गई थी रोज की तरह उस दिन भी मैं अपने ऑफिस से दूसरी यूनिट के लिए निकली कोहरा ज्यादा था इसलिए गाड़ी बहुत धीमे चल रही थी तभी ड्राइवर ने अचानक गाड़ी रोक दी मैं पूछ ही रही थी कि क्या हुआ तभी बाहर से शोर की आवाज कानों में आयी मैंने बाहर आकर देखा तो एक कार का एक्सिडेंट हो गया था और कुछ लोग मदद के लिए गाडियों को रूकवा रहे थे लेकिन कोई रूक नहीं रहा था,मेरे ड्राइवर ने भी मना कर दिया कि ऑफिस की गाड़ी है मेरी नौकरी चली जायेगी मैं मदद नहीं कर सकता। तब तक मैं कार के और पास चली गयी थी अंदर से कराहने की आवाजें आ रही थीं पर कार इतनी बुरी तरह पिचक गयी थी कि कुछ दिखाई नहीं दे रहा था यहसब देखकर मैं बहुत घबरा गई। कुछ लोग घायलों को बाहर निकालने में लगे हुए थे और हमसे उन्हें हॉस्पिटल पहुँचाने को कह रहे थे मैंने अपने ड्राइवर से कहा आप चिंता मतकरो मैं आपके ऊपर कोई परेशानी नहीं आने दूंगी।

इस समय इन्हें लेकर हॉस्पिटल चलो उस कार में चार लड़कियाँ थीं जिन्हें लोगों की मदद से गाड़ी में रखवाकर हम हॉस्पिटल की तरफ चल दिये मैं कभी एक के पास जाती कभी दूसरी के पास जाकर तसल्ली देती कि अभी डॉक्टर के पास पहुँच जायेंगे। एक लड़की का चेहरा अपनी चुन्नी से साफ करते हुए मैं चौंक गई मुझे वह पहचाना हुआ लगा मैंने पलटकर तीनों के चेहरे देखे तो मैं काँप गई यह चारों लड़कियाँ तो मेरी यूनिट की ही थीं। इतना भयानक एक्सिडेंट कि मैं उनके ही चेहरे नहीं पहचान पायी जो रोज मुझे मिलती हैं,हॉस्पिटल पहुँचकर उनका इलाज जल्दी शुरु करवाने के लिए स्टाफ की बहुत मिनत करनी पड़ी, मैं चारो के पास बारी-बारी से भागती रही दो लड़कियों के लिए डॉक्टर्स ने साफ कह दिया कि बचना मुश्किल है। थोड़ी देर में दोनों का जीवन से संघर्ष खत्म हो गया अब मैं दूसरी लड़कियों के लिए बहुत ड़र गई मुझे दिख गया कि इन्हें दूसरे हॉस्पिटल ले जाना जरूरी है मुश्किल से डिस्चार्ज करवाया तब तक उनके परिवार वाले भी पहुँच गए मेरी कम्पनी ने एम्बुलेंस का इंतजाम करवा दिया ,और दिल्ली एम्स के लिए बात कर ली मुझे कहा कि अब आप घर चले जाईये उनके परिवार वाले उन्हें लेकर दिल्ली चले जायेंगे लेकिन उनमे से एक के पापा रोने लगे और कहने लगे कि बेटा तुम हमारे साथ चलो हम नहीं कर पाएंगे मैं इन्कार नहीं कर पायी एम्स जाकर उनका इलाज शुरु हुआ।

रात के बारह या एक बजे मैं वापस अपने घर पहुँची मानसिक रूप से बहुत टूट गयी थी दो साथियों को खोकर।बाद में उन लड़कियों के काँट्रेक्टर  मम्मी-पापा से मिलने घर आये और बोले मैं तो हताश होकर एक तरफ बैठ गया था और देख रहा था कि एक बीस-इक्कीस साल की लड़की इधर से उधर दौड़ रही है कैसे अकेले सब सम्भाल रही है ऑफिस में भी सब यही कह रहे थे कि तुमने जो किया हम नहीं कर सकते थे। उन लड़कियों के परिवार वाले भी यही कह रहे थे कि हमें तो कुछ समझ नहीं आ रहा था इस लड़की ने समय पर सही निर्णय लेकर हमारी बेटियाँ हमें लौटा दी हैं।

छब्बीस जनवरी को इसीलिये मुझे यह 'मानवता सम्मान' दिया गया था कम्पनी के मालिक के हाथों से यह कहते हुए कि हमें गर्व है कि आप हमारे यहाँ काम करती हो।

 सुमेधास्वलेख।(सत्य घटना )

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