झूठी रस्में! Blog post by Prem Bajaj #वेडिंगसीज़न

झूठी रस्में! Blog post by Prem Bajaj #वेडिंगसीज़न

शादी दो लोगों का ही नहीं दो परिवारों का मिलन होता है। इसलिए कभी-कभी दोनों परिवारों की रस्में, रीति-रिवाज अलग भी होते हैं। माना कि हल्दी, मेंहदी इत्यादि रस्में सभी करते हैं मगर कुछ एक रस्में अलग भी होती हैं जो सभी नहीं निभाते।


जैसे की घड़ौली भरने की एक रस्म होती है जो हमारे परिवार में नहीं है और किसी-किसी में ये रस्म बड़ी धूमधाम है मनाते हैं।

इसी तरह ही सबकी अलग-अलग रस्में होती हैं। हमारे एक पड़ोसी हैं जिनमें एक रस्म होती है कि दुल्हा शादी से एक दिन पहले रूठ कर घर से चला जाता है और फिर उसे मना कर लाया जाता है, जिसमें दुल्हा अपनी डिमांड पूरी होने पर ही मानता है।


हम लोग ये सब नहीं जानते थे, उनके बेटे की शादी और वो हमें जैसे हर रस्म पर बुलाते थे, वैसे उस दिन भी बुलाया कि आज बेटा रूठ कर जा रहा है, शाम को सब मनाने चलेंगे। हम भी शाम को तैयार होकर उनके साथ ढोल बजाते, नाचते-गाते सब गए लड़के को मनाने। लेकिन रास्ते में सब अटकलें लगाई रहे थे कि लड़का क्या डिमांड रखेगा, उन दिनों हांडा सिटी नई-नई कार लांच हुई थी , कोई कहता कि कितने दिनों से हांडा की कार लेने की सोच रहा था, लेकिन पापा ने अभी लेकर नहीं दी, शायद वो ही मांगेगा, कोई कहता नहीं , कुछ कैश या गोल्ड का कुछ मांगेगा। लेकिन कुछ लोग ऐसे भी थे जो ये कहने लगे कि ये सब तो उसे कल दहेज में मिल ही जाना है, फिर वो ऐसी चीजें क्यों मांगेगा?

इसी तरह हम वहां पहुंचे जहां लड़का रूठकर चला गया था, चाय-नाश्ता करने के बाद माता-पिता ने बोला कि बेटा बोलो तुम्हारी क्या डिमांड है, वो पूरी करते हैं और चलो शादी का जोड़ा पहनों।

लड़के की डिमांड सुन कर आंखें नम हो गई, और उसके माता-पिता के लिए श्रद्धा से झुक गई सबकी आंखें।

लिजिए लड़के की डिमांड आपको बताते हैं ?

मां-पापा, मुझे कुछ नहीं चाहिए, बस मुझे एक वचन दिजिए, जब भी कोई लड़का किसी लड़की को ब्याहने जाता हैं, वो अपने माता-पिता की राजदुलारी होती है, तो उसे घर की नौकरानी क्यों समझिए जाता है?


जब कोई माता-पिता अपने जिगर का टुकड़ा ही सोंप देते हैं तो उससे बढ़कर दहेज क्या होगा, क्यों दहेज की डिमांड की जाती है?


अगर कोई स्त्री मां नहीं बन सकती या लड़कियां ही पैदा होती है तो इसमें लड़की को क्यों दोषी ठहराया जाता है?


बहू को बहू की तरह ना समझ कर अगर बेटी समझा जाए तो बहू भी बेटी बन सकती है ।


मुझे इन झूठी रस्मों को नहीं निभाना ।


मैं नहीं चाहता हमारे परिवार में ऐसी दास्तां दोहराई जाए। और बिना दहेज के उस दिन वो शादी होती है।

धन्य हैं ऐसे माता-पिता और उनके संस्कार ?


प्रेम बजाज ©®

जगाधरी ( यमुनानगर)

What's Your Reaction?

like
0
dislike
0
love
0
funny
0
angry
0
sad
0
wow
0