जोड़ियां बेशक आसमान में बनती हैं और ससुराल धरती पर

जोड़ियां बेशक आसमान में बनती हैं और ससुराल धरती पर
कहते हैं जोड़ियां आसमान में बनती हैं । हाँ जी जरूर बनती होंगी क्योंकि देर सबेर हम अपने जोड़े के साथ पटरी बिठा ही लेते हैं। पर ये ससुराल का मिलान पता नहीं किस लग्न पत्रिका के आधार पर होता है कि जिंदगी निकल जाती है तारतम्य बिठाते -बिठाते।जोड़ियां बेशक आसमान में बनती हैं पर ससुराल यहीं धरती पर मिलती है। क्या कहा, मेरी बात पर यकीन नहीं हो रहा ?? जरा अपनी माँ , माँजी , ताई जी ,चाची जी ,मौसी जी.... किसी भी बुजुर्ग महिला से पूछ लीजिए ,दूध का दूध और पानी का पानी न हो जाए तो कहना ! मुई ससुराल है ही ऐसी जगह जहाँ होकर भी चैन नहीं और पहुँच कर भी चैन नहीं....मतलब हर हाल में 'रायता फैलना' ही है। 
  बहनों ,ससुराल गाथा पर तो ग्रंथ लिख दी जाए। पर चलिए आज सिर्फ शालिनी के ससुराल की बात करती हूँ। पर प्लीज पूरी सहानुभूति रखना उसके प्रति !
 
नई दिल्ली में पली-बढ़ी शालिनी खूब स्मार्ट ,टिप-टॉप आधुनिक सी लड़की है। डी.यू में पढ़ते पढ़ते और बिहारियों पर हँसते हँसते पता नहीं कब एक ठेठ बिहारी बाँका छलिया संतोष सिन्हा को दिल दे बैठी। संतोष सिन्हा भी पूरा संतोषी माता का भक्त था ,उसने शालिनी को स्पष्ट शब्दों में कह दिया कि पहले यूपीएससी क्लीयर करेंगे ,उसके बाद ही मम्मी से बात करेंगे। और उससे भी जरूरी बात कि मम्मी हाँ करेंगी, तभी ही शादी करेंगे। लो जी, यहां तो बात पहले ही संतोषी माता और सासु माता के चरणों में आकर टिक गई। 
खैर, बिहारी अगर ठान लें तो क्या नहीं कर लें ! पहले ही अटेम्ट में संतोष ने छप्पड़ फाड़कर नंबर लाए और आइएएस पद पर बहाली हो गई। शालिनी को भी अपने रैंक के अनुसार रिवैन्यू डिपार्टमेंट में नौकरी लग गई। फिर बात पहुँची शादी की। शालिनी के परिवार वाले संतोष की मम्मी -पापा, विशेषकर मम्मी आभा जी मिलकर काफी प्रभावित हुए। तेज तर्रार स्मार्ट लेडी थीं। कहीं कोई डिमांड नहीं, पढ़ा लिखा समझदार परिवार तो भला कोई परेशानी कैसी हो ! चट मँगनी और पट ब्याह की तर्ज पर संतोष और शालिनी परिणय सूत्र में बँध गये। 
पर ससुराल तो आखिर ससुराल होता है .....क्या आम क्या खास ! नहीं ,नहीं घबड़ाने वाली तो कोई बात ही नहीं है.... आपको लगता है कि ऐसे संभ्रांत परिवार में किसी तरह की बंदिशें या बेसिरपैर की प्रथा हो सकती हैं ? बिल्कुल नहीं। सबकुछ बहुत आराम-आराम से और सुव्यवस्थित तरीक़े से हो रहा था।परिवार के नाम पर सास ,ससुर एक शादीशुदा नंद .....कहीं कोई रोक-टोक नहीं ,पाबंदी नहीं। जैसे रहना है रहो ,जो पहनना है पहनो। तब समस्या क्या है भाई ????? बताती हूँ,बताती हूँ.......
शालिनी जो ,अगर भगवान के सामने हाथ जोड़ दे तो एकबारगी प्रभु भी घबड़ा जाएँ कि ये क्या हो रहा है। तभी तो उसने एक बार मन से संतोष को माँगा तो ईश्वर ने बिना वक्त गँवाए संतोष को उसकी झोली में डाल दिया था।
शादी हुई और परिवार की पहली आउटिंग माता के मंदिर की हुई। फिर अगले दिन राम मंदिर, शिव मंदिर, हनुमान मंदिर और ये सिलसिला चलता रहा। यहां तक तो ठीक था।शालिनी का सब्र तो तब टूटा जब हनीमून के नाम पर पूरे परिवार ने इकट्ठे माता वैष्णो देवी मंदिर जाने का प्रोग्राम बनाया जिसमें मम्मी जी,पापा जी के अलावा नंद,नंदोई और उनका दूधमुँहा बेटा भी शामिल था। तीन साल के शादीशुदा जीवन में उसने जितने तीर्थस्थान देख लिए उतने आजतक के जीवन में नहीं देखे थे।
 
ऐसे पारंपरिक, धार्मिक परिवार में सिर्फ और सिर्फ शालिनी से एक ही बात की अपेक्षा थी और वो ये कि वो रोज सुबह स्नान आदि के बाद भगवान जी के आगे धूपबत्ती दिखाए ,थोड़ी पूजापाठ कर ले फिर अपनी दिन की शुरुआत करे। सिंपल, बस यहीं एक खास डिमांड थी आभा जी की और दबी जुबान से संतोष की भी। और बस, यहीं हो गया .....बेड़ा गर्क। शालिनी से सारे काम करवा लो पर बेमन से ईश्वर भक्ति उससे ना होती है जी। यहीं है सारे फसाद की जड़। जहाँ वो खुद के बिजी शेड्यूल की दलीलें देती कि संतोष उसी वक्त अपनी दिनचर्या सुना देता...." उच्च पदासीन होने से ईश्वर भक्ति थोड़े न कम हो जाती है।" मम्मी जी को भी ले देकर अपनी बहू से बस एक यहीं मलाल रहता। 
 
खैर ,जीवन नैया पार हो रही है। शालिनी ने बीच का रास्ता निकाल लिया है। सुबह सुबह दफ्तर जाने के पहले अगरबत्ती जलाकर जोर से घंटी बजाकर अपनी ड्यूटी का एलान कर देती है। रही बात पूजा की तो ,ईश्वर के साथ उसकी डायरेक्ट अंडरस्टेंडिंग है .... कृष्णा सब समझते हैं।गाहेबगाहे छुट्टी वाले दिन वो भजन संध्या की व्यवस्था कर देती है ,महीने में एकाध दिन फलाहार कर लेती है .....सर्वत्र शांति और सुख संपन्नता का वास है। शालिनी ने बखूबी समझ लिया कि इन्हीं छोटी-छोटी कोशिशों से वो अपने परिवार में , अपने रिश्ते में सुगंध और सुदृढ़ता ला सकती है। कभी भी दो परिवार एक जैसे कहाँ हो सकते हैं भला !   
 
बस यहीं है छोटी सी कहानी शालिनी की जिसने ससुराल की गलियों में जीना सीख लिया है, जिसका पति उसपर जान छिड़कता है और मम्मी जी की लाड़ली बहू तो वो है ही। 
 
तिन्नी श्रीवास्तव

What's Your Reaction?

like
2
dislike
0
love
0
funny
1
angry
0
sad
0
wow
2