कुछ मेरी यादें सर्दियों की #सर्दियों की गर्माहट

कुछ मेरी यादें सर्दियों की #सर्दियों की गर्माहट

कुछ बातें ऐसी होती हैं जो कभी नहीं भूलती, एक ऐसी ही सर्द रात शायद मैं कभी नहीं भूल पाऊंगी।


दरअसल मेरी शादी की सालगिरह 31 दिसंबर को ही होती है, तो सेलिब्रेशन दोगना हो जाता है।

एक तो नया साल उस पर मेरिज एनिवर्सरी भी, शुरू से ही बड़े जोर-शोर से मनाते हैं। अक्सर हर साल कहीं ना कहीं घूमने निकल जाया करते थे।


शुरू के कुछ साल तो हनीमून के नाम पर फिर बच्चों के साथ घूमने के नाम पर।


अब बच्चे बड़े हो गए हैं, अपने परिवार वाले भी तो बच्चों को नया साल मनाने जबरदस्ती भेजने लगे हम लोग कि एनिवर्सरी तो हमारी हर साल ही आएगी तो क्या तुम लोग नया साल मनाने कभी नहीं जाओगे।


ख़ैर तय हुआ कि कभी-कभी घर पर हमारी साथ एनिवर्सरी मनाएंगे और कभी अपनी फैमिली, अपने दोस्तों के साथ नया साल मनाने जाएंगे।

तीन साल पहले मेरी शादी की 33 वीं सालगिरह थी तब बच्चों को हमने कहा कि वो अपने दोस्तों के साथ एंजॉय करें, हम अब क्या इस बुढ़ापे में कहीं जाएंगे, हम घर पर ही रहेंगे, फोन पर विश कर देना।


ख़ैर 31 दिसम्बर की रात, बच्चे सब गए हुए थे, मैं और मेरे पति हम दो जन। और उस पर कड़कड़ाती सर्दी।

मैंने पूछा, " सुनो जी क्या खाओगे, जो आपको पसंद हो वही पका दूं,

आपके मनपसंद खाना से ही एनिवर्सरी मना दूं"

बोले यूं वो पलट कर मुझको," जाना इतनी ठंडी में क्या हाथ-पैर चलाओगी,

खाना हम बाहर से मंगा लेंगे, क्यों ठंड में बेवजह सिकुड़ जाओगी"

आशिकी इनकी देख कर मेरा भी मन ललचा गया, बस खाना बाहर से आ गया।उस पर बच्चों ने कोरियर से केक भी भिजवा दिया।

लग रही थी ठंड बहुत खाने से पहले बोले ये चलो आज लगा लें पैग एक-एक।

मैं बोली ग़र चढ़ गया नशा तो बवाल हो जाएगा, बच्चे क्या सोचेंगे हमें कौन संभालेगा।

साहब पर इश्क का जुनून सा चढ़ गया, कोलड्रिंक में मिला कर एक प्रकार गई मुझे दिया जो चढ़ गया। अब तो गर्मी तन में आने लगी, मैं भी थोड़ा मस्ती में छा जाने लगी, एक-एक और लगाने की ज़िद कर जाने लगी। ना जाने रात में फिर क्या हुआ, सुबह-सुबह बच्चों ने दरवाज़ा खटखटाया।

बोले पूरी रात फोन हम करते रहे, कोई जवाब ना मिला जब दोनों के फोन से तो हम डरते रहे, सुबह- सवेरे डर कर घर की तरफ भागे, उनके जगाने पर हम जब जागे, घर में सारा सामान इधर-उधर था, कपड़ों का हम दोनों को ना कोई फ़िक्र था। दरवाज़े की खट-खट से खुली आंख कपड़ों को ढूंढने लगे, शर्म से हम दोनों मुस्करा कर एक - दूजे को घूरने लगे।

जब आती है याद उस रात की, सर्द रात भी बरसा देती है गर्मी, ऐसी थी वो हमारी रात, भला कोई कैसे भूले उफ्फ वो रात।



प्रेम बजाज ©®

जगाधरी ( यमुनानगर)

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