कहीं मैं मर गयी तो ?

कहीं मैं मर गयी तो ?

१४ साल की उम्र और नौवीं कक्षा में वो भूगोल की क्लास मैं शायद कभी नहीं भूल पाउंगी। ब्लैकबोर्ड पर दुनिया का मानचित्र बन रहा था और मेरे मन के अंदर का भूगोल चिल्ला चिल्ला कर कह रहा था " नहीं इतनी जल्दी नहीं , अभी तो सारी दुनिया घूमनी है , बहुत जीना है। मुझे नहीं मरना इतना जल्दी। हम्म सही पढ़ा आपने , यही सब आवाज़ मेरे अंदर के भूगोल से आ रही थी।  टीचर क्लास खत्म करके जा चुकी थी। 

और एक क्लास खत्म होने के बाद दूसरी क्लास शुरू होने के बीच पूरे स्कूल का एक राउंड लगाना तो बहुत ज़रूरी हुआ करता था। तो बस मेरी सहेली ने मेरा हाथ थामा और बोली चल एक चक्कर लगाकर आते हैं। मैं जितने जोश से अपनी डेस्क से उठी , उतनी ही तेजी से बैठ भी गयी। कुछ तो गड़बड़ है , मेरा लाल पीला चेहरा देखकर मेरी सहेली ने मेरे माथे पर हाथ रखा और पूछा " क्या हुआ , तू ठीक हैं न , क्यों मुँह लटकाया है , चल न फिर क्लास शुरू हो जाएगी , चल न। 

मैं नहीं जाउंगी आज , तुम चली जाओ ,मैं थक जाती हूँ। मैंने ना जाने का बहाना बना दिया। और चुपचाप उठकर वाशरूम चली गयी। अरे ये क्या इतना सारा खून , शायद मैं मरने वाली हूँ ! टॉयलेट में खून देख कर शायद यही सब ,किसी के भी दिमाग में आएगा। मुँह लटकाकर और बिचारा बने हुए स्कूल में पूरा दिन जैसे तैसे काट लिया।  रास्ते भर सोचती रही " नहीं नहीं मैं मर नहीं सकती " शायद् मैंने कुछ गरम खाया होगा इसलिए ऐसा हुआ , जैसे नाक से खून आ जाता है कभी कभी , वैसा ही शायद कुछ हुआ है , ठीक हो जायेगा। घर पहुंचकर चुपचाप खाना खाया और सो गयी , शाम को बैड से उतरने के लिए पाँव नीचे ज़मीन पर रखा , तो फिर से वही , मेरे बॉडी के भूगोल ने शायद ठान ली थी की बिटिया अब तुम्हारा समय ख़त्म होने वाला।  

फिर वाशरूम की तरफ दौड़ लगायी। अब पहले से ज़्यादा खून देख कर और ज़्यादा डर लग गया। बाहर निकल कर सोचा , शायद अब माँ को बता देना चाहिए " की तुम्हारी लाड़ली बिटिया अब शायद कुछ दिनों की मेहमान है। उफ़ कितना दर्द भरा ख्याल था ये , कितने सारे नए नए पकवान खाने को रह गए थे। और देश विदेश भी तो घूमना था। सोचते सोचते मैं माँ के पास जा कर बैठ गयी , माँ माँ , हम्म्म मटर छीलते हुए माँ ने जवाब दिया " मैंने फिर बात बदल दी " माँ आज खाने में क्या बनाओगी ? देख न मटर छील रही हूँ , आलू मटर की सब्ज़ी बनेगी आज तुझे पसंद है न। 

माँ मटर छील कर रसोई में ले गयी और मैं कुछ नहीं बोल पायी।  काश दीदी घर पर होती , उसे बता देती , यही बार सोच रही थी। पर धीरे धीरे हालात ख़राब हो रही थी , इसलिए मैंने माँ का हाथ पकड़ा और उनसे कहा माँ " खून :(  इतना कहना था माँ ने सर पर हाथ फेरा और कहा " अरे तो इसमें डरने जैसा कुछ नहीं " तुम बस थोड़ी और बड़ी हो रही हो , ये नार्मल है लाडो।  माँ की बात सुनकर जैसे ख़ुशी का ठिकाना नहीं रहा। मैं मरने नहीं वाली ये ख्याल मुझे दुनिया भर की ख़ुशी दे गया। 

ये थी मेरे पहले पीरियड की छोटी सी कहानी , उस समय में बायोलॉजी की किताब में एक पूरा lesson होता था माहवारी /पीरियड्स पर। पर टीचर उसे अपने आप पढ़ने के लिए कह दिया करती थी और रही बात घर में पहले से किसी का इस विषय पर बात करना वो भी आम नहीं था। 

मगर अब चीज़ें बदल रही हैं , स्कूल और घर में बच्चे बहुत कुछ पहले से ही जान लेते हैं।  आप अगर एक बेटी की माँ हैं ,तो आपको अपनी बेटी को पहले से इस पीरियड्स के बारे में बता सकती हैं। बहुत सारी आसान किताबें और कॉमिक्स के ज़रिये आप बेटी को पहले से ही पीरियड्स के लिए तैयार कर सकती हैं। 

आपकी क्या कहानी रही पहले पीरियड्स की , ज़रूर शेयर करें , जिससे महिलाओं को पीरियड्स जैसे अहम् विषय पर बात करने में कोई झिझक न हो। 

#MyFirstPeriod

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