कम्बल- Story written by Deepti Singh

कम्बल- Story written by Deepti Singh

" रिद्धि तो मुझे कुछ समझती ही नही है.. इनकी भी कोई बात नही सुनती .. कभी कभार तो बेटे से भी झड़प हो जाती है .. सोचा था बहु आ जायेगी तो थोड़ी सेवा -टहल हो जाएगी लेकिन भाग्य में तो बहु का सुख है ही नही .." लंच के दौरान स्टाफ -रूम में रचना बताने लगी।


रचना ने ही मुझे बताया था रिद्धि की माँ विधवा है नौकरी भी अनुकम्पा के आधार पर मिली थी।


तब मैं बोली थी "कितना मुश्किल सफर रहा होगा रिद्धि की माँ का.. अकेले दोनो बच्चों को पालना -पढ़ाना, तुम तो भाग्यशाली हो.. पी. एच. डी. बहु मिली है. "


" क्या मुश्किल? .. खूब तेज है ,सीधी सादी औरत नही है मैं तो एक नजर में पहचान लेती हूँ सबको.. उँह.. अगर रिद्धि पी. एच. डी. है तो क्या हुआ? मैं भी तो एम .ए. ,बी. एड. हूँ.."


" हमारे साथ पति है हिम्मत बंधी रहती है.. रही रिद्धि की माँ के तेज होने की बात ,अकेली औरत तेज न हो तो दुनिया ही उसे बेच खाये .."


रचना ने अपनी बात को ही ऊपर रखा , बात आयी -गयी हो गयी।


एक ही शहर में दोनो परिवार थे अतः विवाह में मैं भी शरीक हुई ।


रचना के पति ने अपने सम्बंधियों की, जिन्हें इस रिश्ते में समधी की उपाधि मिली थी उनकी मिलनी डबल बैड के कम्बल से करवाई तथा उन सबकी पत्नियों को पाँच- पाँच सौ रुपये दिलाये ।


रचना दो व्यक्तियों लिए बोली " ये मेरे दो दामाद है इन्हें भी कम्बल दीजिये । "


रिद्धि की माँ ने असमर्थता जाहिर करते हुए एक व्यक्ति के कान में कुछ कहा ।


" मैं रिद्धि का मामा हूँ मुझसे बात कीजिये ; हमें तो यही पता है आपका एक ही बेटा है बेटी नही है... फिर ये दामाद कैसे ?"


" हाँ !मेरा एक ही बेटा है लेकिन जेठ की बेटियां भी तो मेरी ही बेटियाँ हुई ना..इस नाते ये मेरे भी दामाद हुए.." रचना ठंडे स्वर में समझाती हुई बोली


"अभी आप अपने भाई या बहन के दामाद को ले आएंगी ...फिर आपने जितने समधी बताये थे हम उतने ही कम्बल लाये..अब हमारे पास कम्बल नही है

"

रिद्धि के मामा ने भी पलटवार किया।

"मेरा बेटा इंजीनियर है..... उसके लिए तो कार मिल रही थी मैं तो आपसे सिर्फ यही माँग रही हूं " रचना तेज स्वर में बोली।


" हमारी बेटी भी पी. एच. डी. है... आपने कहा था कि दावत का आधा खर्चा आप की तरफ से होगा ...परसों आप ने साफ इंकार कर दिया अब बजट के अनुसार जो खाना रखा गया है वही आपको स्वीकार करना होगा।"


दोनो पक्षों में तनातनी बढ़ती देखी तो रचना के भाई ने बीच में पड़ कर मामला ठंडा कर दिया।


मैंने रचना से पूछा "दुल्हन कहाँ है ?..."


"तैयार हो कर ब्यूटी-पार्लर से आधे घण्टे में आएगी" लापरवाही से रचना बोली।


उधर स्टेज पर रचना का बेटा इन सब बातों से बेख़बर तरह-तरह की पोज में फोटो खिंचवा रहा था।


रचना की बात सुन कर आज मेरा मन बोल रहा था "रचना ! भाग्य जैसा कुछ नही होता, हमारे फैसलों के नतीजे को ही भाग्य कहते है... तुमने तो रिश्ते पहले ही ठंडे कर दिए अब कौन सा कम्बल लाओगी? जो इस रिश्ते में गरमाहट ला सके।"


दीप्ति सिंह (स्वरचित एवं मौलिक)



What's Your Reaction?

like
1
dislike
0
love
0
funny
0
angry
0
sad
0
wow
0