कन्यादान नहीं कन्या आदान कहिए- Blog post by Bhavna Thaker

कन्यादान नहीं कन्या आदान कहिए- Blog post by Bhavna Thaker

मैं सिया सत्येन्द्र पाल, ज़िंदगी की अठखेलियों से अन्जान जिए जा रही थी। मुझे कहाँ पता था न धरती मेरी है न आसमान। इतनी अनमनी भी नहीं थी, दो भाईयों की इकलौती बहन हूँ, नैहर का आँगन मेरी पहचान है। जहाँ खा खेलकर पली बड़ी।

दद्दू और दादी मुझे तुलसी कहते थे, दादी बहुत बार कहती जिनके पुण्य कर्म का उदय होता है उनके यहाँ बेटी का जन्म होता है। बेटी लक्ष्मी का रुप और घर की शोभा होती है। पर दादी एक बात ओर भी कहती थी बेटी तो पराया धन होती है, पीहर का पानेतर पहनकर ससुराल जाती है और पति के नाम की चुनरी ओढ़े दूसरे कूल की हो जाती है। और वहीं से उसकी अर्थी उठती है।


माँ की ममता की छाँव मेरा सबसे बड़ा संबल था, जिनकी छत्रछाया में अपने आप को महफ़ूज़ समझते ज़िंदगी की हर चुनौतियों से लड़ने का ठान लेती थी। माँ ने माँ शब्द को चरितार्थ किया था, मेरे मौन को भी महसूस कर लेती मेरी माँ मेरी आँखें पढ़ने में माहिर है। मेरे चेहरे की हल्की सी शिकन का दर्पण मेरी माँ की आँखें थी। पर माँ की भी एक बात मुझे कचोटती रहती। माँ मुझे चिरैया कहती थी और हंमेशा ये बात बोलती, बेटी तो चिरैया है एक दिन उड़ जाती है अपना आशियां बसाने पति के घर।


और पापा की लाड़ली और नखचढ़ी गुड़िया थी मैं। पैर पटकते, ज़िद करते पापा से क्या-क्या करवाती हूँ, और अपनी लाड़ली की एक एक मांग ये कहते पूरी करते की बेटियाँ कितने साल मांगती है? कल को ससुराल चली जाएगी फिर कहाँ कुछ मांगने वाली। और पापा मेरी झोली में हर खुशियाँ ड़ाल देते। पर इतना प्यार, इतना दुलार और इतनी ममता पाने के बाद भी मन में कुछ बातें अखरती है, क्या ये घर मेरा नहीं है? शादी होते ही सबके दिल से उतर जाऊँगी, क्या पापा से फिर कुछ नहीं मांग सकती? चिरैया हूँ तो क्या इस पिंजर से बेगानी हो जाऊँगी? पराया धन कहती है दादी क्या यहाँ कोई मेरा अपना नहीं। ससुराल चली जाऊँगी तो क्या पराई हो जाऊँगी?


ऐसे अनगिनत सवालों से घिरी मैं असमंजस में थी कि एक दिन मीत मेहरा अपने परिवार के साथ मुझे देखने के लिए आ धमका। दिखने में हीरो जैसा, बड़ा परिवार, बड़ा नाम इकलौता बेटा और मैकेनिकल इंजीनियर। परिवार के सारे सदस्यों की नज़र ठहर गई। समझो मायके से मेरा दाना पानी उठ गया। मीत ने सिर्फ़ मुझसे दस मिनट बात की और अपनी तरफ़ से शादी के लिए मंज़ूरी देकर चला गया।


मुझे मीत पर गुस्सा आ रहा था, क्यूँ हाँ कह दी मुझे मेरे अपनों से छीन कर ले जाएगा, शादी जरूरी है क्या? क्या मैं पूरी ज़िंदगी मायके में माँ-पापा के साथ नहीं रह सकती। किसने बनाए ये रिवाज़। माँ ने बिन बोले ही मेरी नाराज़गी समझ ली और आँखों से ही पूछा क्या हुआ? मैंने सर हिलाकर कहा नथिंग। माँ को संतोष नहीं हुआ पर मन में निश्चय जरूर किया की आराम से पूछती हूँ।


देखते ही देखते शादी पक्की भी हो गई शोपिंग, केटरिंग, मंडप, निमंत्रण पत्रिका की पसंदगी कितनी चहल-पहल मच गई थी। माँ ऐसे शोपिंग करवा रही थी मानों आख़री बार जितना हो सके मुझे दे देना चाहती हो। इन सबके के बीच मेरे मन में एक उधेड़ बुन चल रही थी अब मैं पराई हो जाऊँगी, इस घर पर मेरा कोई अधिकार नहीं रहेगा। सब भूला तो नहीं देंगे मुझे, मेरी आँखें नम हो जाती थी। शादी को अब एक हफ़्ता रह गया था कि अनिता बुआ सपरिवार आ गई और आते ही माँ से बोली, भाभी किस्मत वाली हो जो उपर वाले ने आपके घर बेटी दी है, कन्या दान का पुण्य पाओगे। और इतना सुनते ही मेरा दिल धड़क चुक गया कन्या दान?...क्या मैं कोई चीज़ हूँ जो मुझे दान कर दिया जाएगा, एक देगा और दूसरा लेगा। मैं दौड़ती हुई अपने कमरे में आ गई और फूट-फूटकर रोने लगी। भगवान के साथ झगड़ा करते बोली क्यूँ बनाया आपने मुझे बेटी, माँ-पापा मेरा दान तो कर देंगे पर क्या लेने वालों को मेरी कद्र होगी। जाने आने वाली ज़िंदगी मेरी कैसे बीतेगी। दान में मिली वस्तुओं का कहाँ कोई मोल होता है। मेरे खयालों में खलेल करती दरवाज़े पर दस्तक हुई। मैंने दरवाज़ा खोला सामने माँ खड़ी थी। मैं बैड पर बैठ गई, माँ मेरी बाजु में बैठ गई और मेरा हाथ अपने हाथ में लेकर बोली। बेटी मन में कोई मलाल मत रख, हर बेटी को ससुराल जाना होता है, दुनिया का दस्तूर है। तेरे ससुराल वाले तुम्हारे पापा के पहचान वाले है और बहुत अच्छे है, हमने छानबीन करके ही तेरा रिश्ता पक्का किया है। मैं माँ से लिपट गई और अपने मन में उठ रहे सारे सवालों की गठरी खोल दी और कहा।


माँ मैं कोई चीज़ हूँ क्या जो मेरा दान कर दिया जाएगा, माँ ने मेरा चेहरा अपनी हथेलियों में लेकर मेरा सर चूम लिया और बोली ना..ना मेरी लाड़ो तू तो हमारा मान है, अभिमान है। ये कन्या दान शब्द सदियों से चली आ रही परंपरा का हिस्सा है। हम तुम्हारा दान नहीं करेंगे पूरे सम्मान के साथ मीत के महफ़ूज़ हाथ में तेरा हाथ सौपेंगे। तुम तो हमारे घर की तुलसी हो। बस पौधे को हल्के से उठाकर इस आँगन से उस आँगन में बोना है और तुझे हंसते-खेलते पनपना है और दो कूलों को अपने संस्कारों से दीपाना है।


कन्या दान का सही मतलब कन्या आदान है मतलब पिता कन्या का विवाह करते समय उसके पति से कहते है की आज तक अपनी बेटी को मैंने राजकुमारी की तरह पाल पोषकर बड़ा किया अब तुम्हारे हाथ में इसका हाथ सौंपता हूँ, अब मेरी बेटी की ज़िम्मेदारी आपकी है। तो बस वक्त के चलते कन्या आदान का अपभ्रंश होते कन्यादान हो गया। और कन्या आदान की इस विधि में पति-पत्नी सन्भ्रान्त व्यक्तियों के सम्मुख अपने निश्चय की, प्रतिज्ञा-बन्धन की घोषणा करते हैं।


यह प्रतिज्ञा समारोह विवाह संस्कार है। तुम हंमेशा इस घर का हिस्सा थी, हो और रहोगी पूरे हक और अधिकार के साथ समझी। तो अपने मन से शक को अलविदा कह दो और खुशी-खुशी मीत को अपना हमसफ़र बनाने के लिए तैयार हो जाओ।


माँ की बात सुनकर अच्छा लगा और दिल से एक बोझ उतर गया। आज शादी के मंडप में मीत के पहलू में बैठते हुए अपनेपन का एहसास हो रहा है।


जब लेन-देन की जब बात चली तो मीत और उनके घर वालों ने कहा, हमें कुछ नहीं चाहिए आप अपने जिगर का टुकड़ा हमें सौंप रहे है यही बड़ी बात है हमारे लिए। ये सुनकर मीत के प्रति मेरा सम्मान और बढ़ गया।


हस्त मिलाप के समय पंडित जी ने जब कहा की कन्यादान का समय हो गया है अपनी बेटी का हाथ दामाद के हाथ में सौंपकर रस्म निभाईये तब माँ-पापा, दादा-दादी और भैया ने कहा पंडित जी हमारी बेटी कोई चीज़ नहीं जो दान कर दें, हम क्न्यादान नहीं करेंगे इस विधि को कन्यामान कहेंगे और पूरे मान-सम्मान के साथ अपनी बेटी का हाथ दामाद जी के हाथों में सौपेंगे। मीत ने भी गर्व के साथ कहा बिलकुल आपका मान आज से मेरे घर का सम्मान है, मैं सहर्ष स्वीकार करता हूँ और वचन देता हूँ आपकी बेटी को उम्र भर पूरे सम्मान के साथ रखूँगा।


सारे मेहमानों ने इस बात पर तालियाँ बजाई और मैं मन का बोझ मायके की दहलीज़ पर छोड़ कर मीत का हाथ थामें एक नये सफ़र पर निकल पड़ी।


सफ़र से कभी थकूँगी तो अपनी माँ के आँचल में पूरे हक से सुस्ताने के लिए आ जाया करूँगी। after all दो घरों की हकदार जो हूँ। हूँ ना?


(भावना ठाकर \"भावु\" बेंगुलूरु)

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