कैसा जीवन या कितना जीवन? कौनसा सवाल है सही!

कैसा जीवन या कितना जीवन? कौनसा सवाल है सही!

जीवन कैसा होना चाहिए या कितना जीवन अर्थात ज़िंदगी होनी चाहिए।

बहुत ही अहम सवाल है।


कुछ लोग समझते हैं कि ज़िन्दगी अगर लम्बी जीए है तो बहुत अच्छा है, कुछ सोचते हैं कि बेशक जीवन छोटा हो मगर अच्छा हो, अर्थात स्वस्थ, संस्कारी, परोपकारी, आस्थावान, पवित्रता से भरा हो।


जैसा कि एक 50 वर्ष के आदमी की मृत्यु हो जाती है, लोग उसकी शोक सभा में जाते हैं, मगर वहां हर इन्सान की ऑंखें अश्रुओं से भीगी हुई हैं। हर इन्सान के जिव्हा पर एक बात है, " हे ईश्वर, इस इन्सान को इतनी जल्दी अपने पास क्यों बुला लिया, ईश्वर हमारी ज़िन्दगी चाहे ले लेते, मगर इसे ना मारते"


लेकिन वहीं पर एक 100 साल के बुजुर्ग की मृत्यु हो जाती है, जो ना तो कोई बीमार था ना कभी उसे देख बुज़ुर्गी का अहसास होता। लेकिन सभी की ज़ुबां पर एक ही बात होती है कि," चलो कोई बात नहीं उसकी इतनी ही उम्र थी, या ईश्वर जो तेरी मर्ज़ी, या कहेंगे कि चलो जो हुआ शायद यही सही था,या जाना तो था ही" और भी ना जाने क्या-क्या बातें करते हैं लोग।

कभी सोचा है ऐसी बातें क्यों,कैसे, किसलिए कही जाती है?


दरअसल एक व्यक्ति जो लम्बी ज़िंदगी तो जीता है, 90 साल या 100 साल, लेकिन वो इन्सानियत के नाम पर एक धब्बा बन कर जिया, कभी किसी का भला नहीं किया, कभी किसी के काम नहीं आया, अपने से छोटे और ग़रीब को घिन और घृणा से देखा, दूसरों की कामयाबी पर ईर्ष्या की, अहम भाव रखा सदैव, किसी अपने या पराए, रिश्ते -नाते की कोई इज्ज़त-मान नहीं किया, कभी बड़े-बुज़ुर्गों का सम्मान नहीं किया, कभी अपने हाथों से कोई पुण्य कर्म या कोई दान-पुण्य नहीं किया, जिसे ईश्वर के प्रति कोई आस्था ना हो, कभी किसी पशु या पक्षी के प्रति दया भाव नहीं रखा। ऐसे इन्सान की ज़िंदगी किस काम की, कौन उसे प्यार करेगा, कौन ऐसे इन्सान को चाहेगा, उसकी मृत्यु पर कौन अफसोस करेगा?


लेकिन इसके विपरित एक इन्सान हर पल दूसरों के भले की सोचता है, परोपकारी है, छोटों के प्रति प्यार और बड़ों के प्रति मान-सम्मान की भावना रखता हो, दूसरों के दुःख में दुखी होने वाला हो, ईश्वर के प्रति आस्था रखता हो, मनुष्य के साथ-साथ पशु पक्षियों पर भी दयाभाव रखता हो, ऐसे इन्सान की मृत्यु पर तो छोटा -बड़ा हर इन्सान अफसोस करेगा, चाहे ऐसा व्यक्ति 50 साल जिए या 100 साल। हर इन्सान ईश्वर से कितनी बार शिकायत करेगा, " कि हे ईश्वर, क्यों ऐसे व्यक्ति को मृत्यु दी, यदि ऐसा व्यक्ति 200 साल तक भी जिवित रहे तो भी कहा जाता है कि ये व्यक्ति अभी ना जाता हमें छोड़कर। वो इन्सान ज़िन्दगी छोटी जिए या बड़ी अर्थात कम उम्र या ज्यादा इससे फर्क नहीं पड़ता, उसने ज़िंदगी कैसी जी है, इस बात से फर्क पड़ता है।


ज़िंदगी ऐसी जिओ कि सब कहें कि वाह कैसी ज़िंदगी जी है! कितनी जी है ये मायने नहीं रखता, कैसी जी ये मायने रखता है।

"जिएं तो अच्छी जिएं,

बेमतलब ज़िंदगी क्यों जिए"


प्रेम बजाज ©®

जगाधरी ( यमुनानगर)


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