क्यूँ न हम स्वयं ही आदर्श बनें?

क्यूँ न हम स्वयं ही आदर्श बनें?

शिष्टता और सदाचार कर्तव्यनिष्ठ जीवन का सोपान है, अपने सुविचारों से और व्यवहार से समाज में अपनी आदर्श छवि प्रस्थापित होती है।

घर परिवार हो, या घूमने फिरने की जगह बस और ट्रेन हो, या दरिया का किनारा हमारी सुख सुविधा के साधन है। हम कई बार देखते है बस में या ट्रेन में पूरा परिवार सफ़र करने निकलता है, माताएं फूड पैकेट बच्चों को पकड़ा देती है और खाने के बाद बच्चें रैपर यहाँ-वहाँ उड़ा देते है। माता-पिता भी गर्व से देखते रहते है, न बच्चों को टोकते है न खुद कचरा उठाते है। बस खानगी हो या सरकारी जानमाल को कुंठित विचारधारा से गंदा करके हम अपनी फुहड़ता का परिचय देते अपना ही नुकसान कर लेते है।

कई बार पान गुटका खाने वाले भी यहाँ वहाँ थूँक देते है। ये तक नहीं सोचते की जगह कौनसी है, आस-पास वालों को कैसा महसूस होगा, यहाँ तक कि एयरपोर्ट तक को नहीं छोड़ा, हर सार्वजनिक जगहों पर पान की पिचकारी कहीं पर देख सकते हो। क्या आप अपने घर में कहीं भी थूँक देते हो? नहीं क्यूँकि घर आपका अपना है आपको वहाँ रहना है। तो देश क्या आपका अपना नहीं? इसे क्यूँ गंदगी का ढ़ेर बनाना है।

नदी किनारे या दरिया किनारे लोग घूमने जाते है तो पानी में प्लास्टिक और बैग रैपर जैसा कचरा बहा देते है, जिसको खाकर जलचर जीव मर जाते है। या तट पर ही पानी की खाली बोतलें कागज़ और रैपर फैंक देते है। हमारी फैंकी हुई गंदगी को उठाने वालें कर्मचारी को धन्यवाद के पात्र है जो हमारे गली मोहल्लों को साफ़ सुथरा रखते है हमारा फैंका बदबूदार कचरा उठाकर ले जाते है। कुछ उनके बारे में भी सोचिए यहाँ वहाँ से कचरा उठाने में उनको कितनी तकलीफ़ होती होगी। बेहतर है कचरा डस्टबिन में ढ़ालने की आदत डालें। स्वच्छ भारत अभियान के तहत हर गली मोहल्लों में और रास्तों पर कचरापेटी लगी ही होती है उसका उपयोग करें।

स्वच्छता प्रिय स्वभाव भी एक डिग्री समान है और सदाचार और शिस्त समाज सेवा से कम नहीं। कई बार कुछ लोग सरेआम गंदी भाषा में, ऊँची आवाज़ में कुछ भी बोल देते है। मंदिरों में या किसी समारोह में धक्का-मुक्की करके अव्यवस्था फैलाना, अपशब्द बोलना, बुज़ुर्गो का अपमान करना, सरकारी कर्मचारियों से गंदी भाषा में बात करके उलझना, पर्यावरण से छेड़खानी करना ये इंसान की गरिमा को हल्की करने वाले कार्य है। क्यूँ न देश को अपना समझ कर साफ़ सुथरा रखने में अपना योगदान दें, मिल जुलकर एकात्मता साधें और अपने शिस्त सभर व्यवहार से समाज में खुद की सुंदर छवि उभारे और देश को उपवन सा बनाएं।

भावना ठाकर "भावु" (बेंगुलूरु, कर्नाटक)

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