क्यों रसभरी जलेबी खाए बिना पूरी नहीं होती दशहरे की पूजा?

क्यों रसभरी जलेबी खाए बिना पूरी नहीं होती दशहरे की पूजा?

दशहरा यानि विजयदशमी का दिन देशभर में बड़ी धूमधाम से सेलिब्रेट किया जाता है। हर भारतीय त्योहार की तरह यह दिन भी खाने-पीने के बिना अधूरा है।

मान्यता है कि दशहरा के दिन रावण दहन के बाद जलेबी जरूर खानी चाहिये , और जलेबी खाए बिना रावण दहन पूरा नहीं होता. इसके पीछे भी एक पारंपरिक कहानी जुड़ी हुई है।

रावण दहन के बाद लोग चाट पकौड़ी और जलेबी खाना नहीं भूलते। चाट पकोड़ी एक बार ना भी खाएं लेकिन जलेबी खाए बिना दशहरा पूरा नहीं माना जाता। उत्तर भारत की बात करें तो दशहरे के दिन जलेबी जरूर खाई जाती है। आप चाहें बाजार से मंगवाएं या घर पर बनाएं लेकिन जलेबी से मुंह मीठा किए बिना रावण दहन भी अधूरा माना जाता है। 

पुराने जमाने में जलेबी को 'कर्णशष्कुलिका' कहा जाता था। एक मराठा ब्राह्मण रघुनाथ ने 17वीं सदी की ऐतिहासिक दस्तावेज में जलेबी बनाने की विधि का उल्लेख किया है, जिसमें उसका नाम कुण्डलिनि है।" कहा जाता है कि जब भगवान श्रीकृष्ण का जन्म हुआ तब पूरे राज्य में जलेबी बंटवाई गई थी, जिसका जिक्र भोजनकुतूहल नामक किताब में मिलता है। कई जगहों पर इसे शश्कुली के नाम से भी वर्णित किया गया है।

कही-कही जलेबी की जगह इमरती खाने की भी परंपरा है,इमरती जलेबी से भी ज्यादा पतली और मीठी होती है। कहा जाता है कि इमरती जलेबी की छोटी बहन है। ऐसे में आप रावण दहन के बाद इमरती भी खा सकते हैं।

वैज्ञानिक तथ्य- दशहरे पर जलेबी- खाने के कुछ वैज्ञानिक तथ्य भी होते हैं। दरअसल, दशहरा ऐसे मौसम में पड़ता है जब दिन गर्म और रातें ठंडी होती हैं। चिकित्सकीय दृष्टि से इस मौसम में जलेबी का सेवन करना अच्छा माना जाता है। गर्म जलेबी कुछ हद तक माइग्रेन का इलाज करने में कारगार है। वहीं, इससे आप बैड कार्ब्स से भी बचे रहते हैं।

दशहरे के दिन पान खाने और बजरंगबली को चढ़ाने का भी विशेष महत्व है। पान को विजय का सूचक माना गया है। पान का 'बीड़ा' शब्द का एक महत्व यह भी है इस दिन हम सन्मार्ग पर चलने का 'बीड़ा' उठाते हैं। 

पान प्रेम का पर्याय है। दशहरे में रावण दहन के बाद पान का बीड़ा खाने की परम्परा है। ऐसा माना जाता है दशहरे के दिन पान खाकर लोग असत्य पर हुई सत्य की जीत की खुशी को व्यक्त करते हैं, और यह बीड़ा उठाते हैं कि वह हमेशा सत्य के मार्ग पर चलेंगे।

 जानकार कहते हैं कि पान का पत्ता मान और सम्मान का प्रतीक है। इसलिए हर शुभ कार्य में इसका उपयोग किया जाता है। 


वैज्ञानिक तथ्य- पान का पत्ता पाचन की प्रक्रिया को सामान्य बनाए रखता है। इसलिए दशहरे के दिन शारीरिक प्रक्रियाओं को सामान्य बनाए रखने के लिए पान खाने की परम्परा है।

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