खुशियों का नया आगाज़

खुशियों का नया आगाज़

माही, जल्दी-जल्दी काम खत्म कर रही थी। दिवाली करीब थी, और सारी खरीददारी उसे ही करनी थी। रमन टूर पर बाहर गये है, दिवाली के एक दिन पहले ही वापस आ पाएंगे।

रधिया को कल जल्दी आने को कह, माही तैयार होने चली गई । मॉल उसके घर के पास में था।बेटे चिंटू के साथ मॉल जाने को निकली, रेड लाइट पर कुछ बच्चे, रंग बिरंगी मोमबत्ती के पैकेट्स ले कर, इधर- उधर भागते दिखाई दिये।एक सात -आठ साल का लड़का, रंगोली के रंग के पैकेट्स ले उसके ऑटो के पास आया,याचना भरी आंखे, जब तक वो कुछ कहता,तब तक ग्रीन लाइट हो गई, ऑटो ने रफ़्तार पकड़ लीं। पर उस लड़के की आँखों में जाने क्या था, माही अनमनी हो गई, उसके चिंटू की उम्र का था वो, पर कितना अंतर था।

मॉल पहुँच, चिंटू की पसंद के कपडे और पटाखे, दो जगह ख़रीदा। "माँ आपने सब दो सेट क्यों ख़रीदा।"। किसी की दिवाली को जगमग बनाने के लियें। वापसी में, उसी रेड लाइट पर, जब वो लड़का नहीं दिखा तो माही ने ऑटो छोड़ कर उसे ढूढ़ने की कोशिश की, और बच्चों से पूछा तो उन्होंने एक पेड़ के नीचे, इशारा किया। देखा वहीं लड़का घुटनों में सर डाले बैठा था। माही ने आवाज दी, कपडे और पटाखे दिया तो बच्चे ने इंकार कर दिया।"मै भीख नहीं लेता "। "मै भी भीख नहीं देती ", ये रंगोली के रंगों के पैकेट्स लेने के बदले दे रही हूँ। किसी तरह उसे सामान लेने को राजी किया।उसका नाम मुन्ना था।

माही अगले दिन फिर उसी रेड लाइट पर कपडे और मिठाई ले कर पहुंची। उन बच्चों को बाँट दिया। बच्चों के मोमबत्ती और रंग, ले, अपनी सोसाइटी में एक दुकान लगवा दिया। सोसाइटी में भी लोगों से आग्रह किया, सभी लोग, मिट्टी के दिये, मोमबत्ती, रंगोली के रंग उन्ही बच्चों से ख़रीदे। अगले दिन माही, पेंट और ब्रश ख़रीदा बच्चों को मिट्टी दिये में कलर करना सीखा दिया। कुछ पुराने कपडे को दिये, कलश पर चिपका, उनको नया रंग -रूप दे दिया। दूसरे दिन उन बच्चों के सारे मिट्टी के दिये, रंगोली के रंग बिक गये। तीसरे दिन फिर बच्चों ने दूकान लगाई। उनको खूब मुनाफा हुआ। बच्चे खुश थे, मुन्ना और रेड लाइट वाले बच्चे, माही को धन्यवाद देने आये। दीदी, आपने कुछ दिनों के लियें हमारे पेट भरने का इंतिजाम कर दिया। जिस दिन भरपेट खाना मिले, वहीं हमारा त्यौहार है।कह सबने दिये के दो सुन्दर सेट माही की ओर बढ़ा दिया।माही की आँखों में आंसू आ गये, उनका प्यार देख,।

उन बच्चों को जीने की एक नई राह, माही ने दिखाई। पहला, एकता में बहुत शक्ति होती, रेड लाइट पर आपस में झगड़ा करने वाले बच्चे, सोसाइटी में दुकान लगा, इस बात को समझ गये। दूसरा, हुनर को इज्जत जरूर मिलनी चाहिए।

दिवाली का दिन, माही, सोसाइटी के कुछ लोगों से आग्रह की, हर घर से दो लोगों का खाना पैक कर उसे दे, जिसे माही, कुछ लोगों के साथ मिल कर, उस रेड लाइट पर रहने वाले लोगों को बाँट आई।

शाम को सजी -धजी माही, आत्मसंतुष्टि से दमक रही थी, इतनी खुशी उसे किसी दिवाली पर नहीं मिली। बालकनी में सजे दिये, अपनी पूरी रौशनी बिखेर रहे थे। कुछ अलग सी ये दिवाली थी माही की। क्योंकि उसने, कुछ और लोगों की दिवाली को रौशनी से भर दिया। पैसा दे सकते है, पर समय दे, किसी के हुनर को विकसित कर, जीविका बनाना, बहुत अलग सा काम है

तो सखियों, आप अपनी दिवाली में किस तरह खुशियों के रंग बिखेर रही, जरूर बताये।

संगीता त्रिपाठी

 #दीपावली 


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