खुदा की रहमत ये लड़कियां

खुदा की रहमत ये लड़कियां



कितनी चँचल, कितनी कोमल, घर की रौनक,
ये लड़कियाँ,
घर के कोने कोने में गूँजती बनकर के रागिनी,
ये लड़कियाँ,
हँसती गाती, दौड़ती भागती, जाने कब सयानी हो जाती,
ये लड़कियाँ,
पापा की लाडली, मां की सहेली, होती एक पहेली,
ये लड़कियाँ,
जिस घर में बीता बचपन वही घर छोड़ जाती हैं,
ये लड़कियाँ,
बाबुल को छोड़ना, ससुराल में बसना, कितनी मुश्किलों से गुजरती,
ये लड़कियाँ,
अपने शौक, अपने सपनों को ज़िम्मेदारियों तले दफ़न करती,
ये लड़कियाँ,
फिर भी ज़ुबान से उफ्फ ना करती ऐसी होती हैं,
ये लड़कियाँ,
दर्द के गहरे घाव भी दिल की गहराई में छिपा जाती हैं,
ये लड़कियाँ,
घर की नेमत, खुदा की रहमत, मां-बाप की किस्मत होती हैं,
ये लड़कियाँ,
घर की सीमा और बाहर का दायरा सब कुछ संभाल चुकी है आजकल,
ये लड़कियाँ,
बनकर झांसी की रानी पूरा देश भी चला सकती हैं,
ये लड़कियाँ,
जल, थल, नभ की रक्षा में कीर्तिमान स्थापित कर चुकी हैं,
ये लड़कियाँ,
अपनी और अपनों की खुशियों में तालमेल बिठाना सीख चुकी हैं,
ये लड़कियाँ,
इनको कमज़ोर न समझना अपने पंखों को परवाज़ दे चुकी हैं,
ये लड़कियाँ।

तबस्सुम युसूफ ✍️
कुवैत

#ये लड़कियाँ
#thursdaypoetrychellenge

What's Your Reaction?

like
0
dislike
0
love
0
funny
0
angry
0
sad
0
wow
0