खूशी के आँसू

 खूशी के आँसू

"भाभी आज नाश्ते मे आलू के परांठे  बना दो ना इतने दिनो से पोहा खा खाकर बोर हो गया हू ।प्लीज "
"हा देवर जी, अभी बना देती हूँ । "
"बहू दलिया बनने मे कितनी देर है? आज थोड़ा जल्दी बना दो फिर लड़की देखने भी तो जाना है हमे ।"
हाँ! मम्मी जी, आप नहा कर आएंगी तब तक तैयार हो जाएगा ।

"भाभी आप भी तैयार हो जाओ न, आप भी चलोगे न "
" नही अभी बहू कैसे चल सकती है, उसे क्या परख है इन बातो की? अभी सिर्फ हम ही चल रहे है "
फिकी मुस्कान बिखेरते हुए अंजली ने कहा, "हा देवर जी, मम्मी जी ठीक ही तो कह रही है ।आप तो पसंद आने पर फोटो दिखा दीजिएगा ।"


सभी नाश्ता करके लड़की देखने के लिए निकल गए और अंजली रसोई समेटने लगी । रसोई ठीक करते हुए उसका हाथ उस कलछी पर चला गया जो उसके ससुराल में पहले दिन की मीठी यादों से जुड़ी थी। शादी के बाद ससुराल में पहले दिन रसोई की रस्म करवाई जाने वाली थी। विदाई होकर जब वह सब ससुराल पहुँचे तब तक चार बज चुकी थी। फिर सारी रस्में निभाते सुबह हो गई। अंजली को जल्दी से तैयार होकर रसोई की रस्म के लिये आने को  कह दिया गया।

वह नहा-धोकर तैयार होकर आ गई।पर राकेश से उसकी एक बार भी बात नही हो पाई। शादी से पहले भी उन दोनों की सिर्फ फोन पर ही बात हुई थी वह भी औपचारिक सी। उसका दिल बहुत जोर से धड़क रहा था ।एक  तो पहली रसोई की टेंशन और ऊपर से इतने समय से अपने जीवन साथी की आवाज़ भी न सुन पाई।सासुजी सभी सामान निकाल कर रख आई थी घर की महिलाओं को बुलाने। सब सामान था पर हलवा हिलाने को कलछी नही मिल रही थी। अंजली ने बहुत ढ़ूंढ़ी पर नहीं मिली। इसी बीच राकेश रसोई मे आया और अंजली की परेशानी का कारण पूछा।

"कलछी नहीं मिल रही "वह सकुचाते हुए बोली।
राकेश ने कलछी ढ़ूंढ़ कर अंजली को देते हुए कहा,"हमें क्या मिलेगा इस मदद के बदले में?"
अंजली शर्माते हुए बोली,"हलवा"
यह सुनते ही राकेश की हँसी छूट गई। इस बीच सासुजी और बाकी रिशतेदार भी आ गई। यह कलछी और पहला संवाद उन दोनों के प्यार का सेतु बन गया। राकेश अंजली के भोलेपन पर फिदा हो गया। 

कुछ देर बाद फोन की घंटी बजी तो अंजली वर्तमान में लौट आई,"भाभी मुझे और बाकी सबको लड़की पसंद है, फोटो घर आकर दिखाता हूँ ।मुझे पता है आपको तब तक कोई कुछ नही बताएगा जब तक आप नही पूछेंगे और मै यह होने नही देना चाहता था इसलिए आपको सबसे पहले  फोन किया ।"

"खुश रहो देवर जी।"कहते हुए अंजली के आँसू छलक आए ।करीब चार साल पहले अंजली का विवाह राकेश से हुआ था जो शर्मा खानदान का बड़ा बेटा है । राकेश दूसरे शहर में एक बैंक मे सरकारी अधिकारी था ।वह एक सीधा और सरल व्यक्तित्व का लड़का था । माँ से विशेष लगाव था ।माँ की कही हुई बात चाहे गलत ही क्यो न प्रतीत हो पत्थर की लकीर होती थी उसके लिए ।यही कारण था कि आज शादी के पांच साल हो जाने पर भी वह अंजली को अपने साथ नही ले जा पाया था ।शादी के बाद की हर दिवाली बेनूर और हर होली फीकी ही रहती थी उसकी ।

शादी के दूसरा साल होते होते राकेश ने अंजली को अपने साथ ले जाने की इच्छा जताई थी पर राकेश की माता जी ने एक वाक्य कहा जिसके आगे सारे तर्क वितर्क धरे रह गए ।उनका कहना था, "पूरी जिंदगी पिसते रहे गृहस्थी मे कभी उफ न करी और न शिकायत अब बुढ़ापे मे भी गृहस्थी मे ही पिसते हुए देखना चाहता है तो ले जा अपनी लुगाई को ऐसे ही मर जाएंगे तुम करो अपनी मर्जी की ।

"बस इतना कहना ही काफी था और राकेश सब समझ गया । अंजली को समझा दिया कि माता-पिता की सेवा कौन करेगा और अंजली इसी को अपनी नियति मान कर चुपचाप वही रूक गई । लेकिन इस घटना के बाद से ही अंजली माताजी की आँख की किरकिरी बन गई । उन्हे लगा जो बेटा मेरे सामने कभी बोल नही पाया उसने इस कल की आई छोरी के लिए मुझसे बहस की ।कही बेटा हाथ से न निकल जाए । अब अंजली को  यह अहसास था कि वह सिर्फ नौकरानी से ज्यादा अहमियत नही रखती उसके सास-ससुर की नजर मे ।बस उसका देवर राहुल था जो उसके दर्द को समझता था और अंजली की बहुत इज्जत करता था । 

लड़की पसंद आ जाने के बाद राहुल की मंगनी हो गई लेकिन छुट्टी न मिल पाने के कारण राकेश नही आ पाया । अंजली बहुत उदास हो गई । जबसे अंजली शादी करके आई थी तबसे उसके हिस्से मे सिर्फ इंतजार ही आया था । यहा भरे पूरे परिवार के बावजूद अकेलापन लगता था ।आखिर जिसके साथ सात वचन लेकर फेरे लिए उसी का साथ नसीब नही और जो कभी-कभार घर आते है छुट्टियो मे तो माताजी अपने लाडले को अकेला ही नही छोड़ती ,कभी कभी तो पूरा दिन अंजली को बिजी रखती रसोई मे, इतना थका देती कि रात होते होते न बात करने की हिम्मत बचती और न जागने की ।

बस यू ही तड़पते तरसते दिन बीत रहे थे । तभी राहुल की शादी की तारीख पक्की हो गई और इस बार राहुल ने अपने भाई को सबसे पहले बताया ताकि वह शादी मे आराम से लम्बी छुट्टी लेकर आए । 

शादी की तैयारियो मे  ज्याद वक्त तो नही था अंजली और राकेश के पास  एक-दूसरे के साथ बिताने को लेकिन रस्म रिवाज के माहौल मे  अंजली को देखकर राकेश अपनी शादी के समय मे खो जाता । वह उसके करीब रहने की कोशिश करता । महिला संगीत मे जब अंजली ने "मोहे  रंग दो लाल" गाना गाया तो राकेश ने उसकी आवाज़ मे दर्द  को बखूबी महसूस किया । इन पांच सालो मे अकेले  रहते रहते  राकेश भी उकता गया था और उसने कोशिश भी की थी कि उसका ट्रांसफर उसके शहर मे हो जाए पर अभी तक सफलता नही मिल पाई थी ।


 तैयारियो मे समय का पता भी नही लगा और देखते ही देखते शादी का दिन भी आ गया । अंजली आज बेहद खुबसूरत लग रही थी और राकेश आँखो ही आँखो मे  उसकी तारीफ करता नही थक रहा था । नियत समय पर बारात निकली और आज गृह प्रवेश था देवरानी का । खूब मन से अंजली ने देवरानी का स्वागत किया । कुछ दिन बाद ही होली पड़ने वाली थी । राकेश ने अपनी पैकिंग शुरू कर दी क्योंकि उसे वापस जाना था । इधर देवरानी भी पगफेरे और होली के लिए पीहर जाने की तैयारी करने लगी क्योंकि पहली होली ससुराल मे नही मनाते ऐसा रिवाज था यहाँ । 


भारी मन से अंजली पैकिंग करवा रही थी राकेश की । इन पांच सालो मे एक बार भी अंजली राकेश के सामने नही रोई चाहे अकेले मे कितना भी रो ले क्योंकि उसे लगता था अकेलापन सिर्फ उसे ही नही उसके पति को भी तो मिला था और यहाँ मेरे पास मेरा परिवार तो है ।वहां यह तो बिल्कुल अकेले है जब यह शिकायत नही करते तो मै कैसे शिकायत कर सकती हूँ । पर इस बार वह रोक नही पाई अपने आप को । वह कुछ कह नही पाई पर उसके आँसूओ ने सब बयान कर दिया । 


अगले दिन सुबह राकेश ने अंजली से तैयार होने को कहा कि हम मंदिर चलेंगे इसलिए पहले तुम नहा धोकर तैयार हो जाओ । वह जब तक नहा कर आई तब तक राकेश सारा सामान लेकर हाॅल मे माताजी के पास बैठ गया। तैयार होकर जैसे ही अंजली बाहर आई उसे माहौल कुछ अलग सा लगा । माताजी आँसू बहा रही थी और राकेश एक तरफ हाथ बांधे खड़े थे । 

अंजली  "क्या हुआ मम्मी जी क्यो रो रही है? "
राकेश "क्योंकि तुम भी मेरे साथ जा रही हो । मै इस बार पहले से ही सोच कर आया था कि तुम्हारे बिना नही जाऊंगा और वापसी के टिकट करवाते समय तुम्हारे भी टिकट करवा लिए थे और यह बात इन्हे पसंद नही आ रही है ।"

अंजली की आँखो मे खुशी के आंसू थे लेकिन वह समझ नही पा रही थी कि इस बात पर वह खुश हो या माताजी के व्यवहार से दुखी । तभी राहुल वहा आया और कहने लगा "पांच साल कोई कम नही होते है मम्मी । फिर भी भैया भाभी आपकी इच्छा का मान करते हुए एक-दूसरे से दूर रहे ।भाभी ने आपको कभी शिकायत का मौका नही दिया फिर चाहे आपने उन्हे कोई मान दिया या नही लेकिन वह अपने कर्तव्य हंँसते हंँसते निभाती रही और रही बात सेवा की तो भाभी ने बहुत कर ली ,जरा अपनी नई बहू को भी मौका दो अपनी सेवा का ।बड़ी खुशी खुशी वह यह सब करेगी । "


राहुल और उसकी बहू दरवाजे तक छोड़ने आए थे अपने भैया भाभी को और माताजी एक तरफ मुंह चढ़ाए खड़ी थी । 

धन्यवाद 
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अनामिका शर्मा

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