खुशियों की महक

खुशियों की महक

अमर इधर से उधर चहलकदमी कर रहा था| कदमों की आवाज उसकी बेचैनी को स्पष्ट बयान कर रही थी| वह चलता रुकता अपनी हथेलियों को रगड़ता और फिर कुछ पल के लिए बैठ जाता|"अमर, बेटा इतना बेचैन होने की जरूरत नहीं है, सब ठीक है अंदर| "
"माँ, पहली बार पिता बन रहा हूँ न! तो आप समझ सकती हो| "

"बधाई हो, लक्ष्मी जी पधारे हैं आपके द्वार, बेटी हुई है| " नर्स ने गुलाबी कपड़े मे लिपटी, छुईमुई सी, रूई के फाहे से भी कोमल बच्ची को कान्ता जी के हाथों में दिया| कान्ता जी की आँखों से ममता बरस रही थीं| उन्हे अपनी बेटियों के अक्स दिखने लगे| याद आ गये वो पल जो उन्होंने अपने तीनों बच्चों के जन्म पर जिये थे|अमर ने अपनी बच्ची को डरते हुए हाथों में उठाया| उसकी आँखों में आँसू थे, मन ही मन वह सोच रहा था, शायद अब सब ठीक हो जाए|

कान्ता जी ने अमर को आँखों ही आँखों में तसल्ली दी और वे अपनी बहू का इंतजार करने लगी| थोड़ी देर में ही उनकी बहू सीमा को वार्ड में शिफ्ट कर दिया गया| कान्ता जी अपनी बहू का बहुत ध्यान रख रहीं थीं और उससे बात करने की कोशिश कर रहीं थीं लेकिन सीमा उन्हें अनदेखा कर रही थी| कुछ ही देर मे सीमा के माता-पिता आ गये और बधाईयों का सिलसिला चल पड़ा| अब कान्ता जी निश्चित होकर बाहर आ गई और अमर से कहा, "बेटा मैं घर जा रही हूँ| बहू का ध्यान रखना और कोई जरूरत हो तो फोन कर देना| "

"रूको मम्मी, मैं चलता हूँ आपके साथ, आप अकेले कैसे जाओगे?""नहीं बेटा, तुम यहीं रहो, अभी सीमा को तुम्हारी जरुरत है| मैं चली जाउंगी| " कहते हुए वे बाहर आ गई और रिक्शे का इंतजार करने लगी| रिक्शे से घर तक का सफर महज आधे घंटे का था लेकिन कान्ता जी का मन इस आधे घंटे में पिछले दो साल की सैर कर आया|

दो साल पहले अमर ने कांता जी के हाथों को अपने हाथ में लेकर कहाँ था , "माँ  आपके लिए बहु पसंद कर ली है पर आपकी इच्छा सर्वोपरि है| आप अच्छे से ठोक बजा के परख लो फिर अपना निर्णय सुना देना| कल ही आपको उससे व उसके घर वालों से मिलवा दूँगा| " 

कान्ता जी ने हँसते हुए हामी भर दी और अगले दिन सबसे मिलने के बाद शादी की बात भी तय हो गई| और कुछ महीनों मे सीमा उनकी बहु बन घर पर आ गई| आजकल की आधुनिक लड़की होते हुए भी सीमा सभी गुणों से संपन्न थी| सुबह जल्दी उठकर  वह योगा भी करती तो नहा धोकर ईशवर को भी स्मरण करती| सबके लिए चाय नाश्ता बनाती और सबके संग बैठकर नाशता भी करती| किसी काम को करने मे परहेज़ नहीं करती| रीति -रीवाज भी निभाती और अपने लिए समय निकाल कर नृत्य भी सीखती|  

पर कान्ता जी खुश नहीं रहती| अपनी बहु खुद चुनने के अधिकार से वंचित होने के कारण एक गांठ सी पड़ गई थी उनके दिल में और वे सीमा को खुले दिल से स्वीकार नहीं कर पा रहीं थी| इस बीच खुशखबरी आई की सीमा माँ बनने वाली है| कान्ता जी मन ही मन बड़ी खुश थी पर वह खुशी जाहिर नहीं करती| सीमा को महसूस तो होता लेकिन वह इन बातों को अनदेखा कर देती| दिन ब दिन अमर और सीमा के बीच बढ़ती नजदीकी और विश्वास को देख कान्ता जी का मन तड़पता| एक दिन उन्होंने अमर से अपने मन की बात कह भी दी, "बेटा बहु चुनने का अधिकार तो छीन लिया तुमने अब क्या घर से भी निष्कासित करने का ईरादा है तुम दोनों का?"

"कैसी बात कर रही हो माँ?""जब से तुम्हारी शादी हुई है तुम मुझे दरकिनार कर सिर्फ सीमा को अहमियत देते हो| हर फैसले में उसे शामिल कर लेते हो| मुझे यह अधिकार तुम्हारी दादी के जाने के बाद मिला और तुम अभी से मुझे मार देना चाहते हो?कितनी चालाकी से सीमा ने यह सब किया और तुम्हें पता भी नहीं चला!लेकिन मुझे यह सब स्वीकार नहीं" एक ही सांस में कान्ता जी ने कह दिया| तभी आहट हुई चाय का कप लिए सीमा गुस्से और अपमान से कांप रही थी उसने सब सुन लिया था|

सीमा का पूरा बदन पसीने से तर था और उसकी आवाज़ भी घुट रही थी| बड़ी हिम्मत कर वह बोली, "माँ जी मैं पूरे मन से आपका दिल जीतने में लगी हूँ| आप कभी खुश नहीं होती| मै तो अपनी माँ समान मानती हूँ आपको| आज तक कभी कोई गलत व्यवहार किया हो आपके साथ तो बताओ? पर यह लांछन| फैसलों में मुझे शामिल करना और हर बात मे मेरी राय लेना यह तो अधिकार है मेरा| क्या गलत है इसमें? जमाना बदल गया है|

बहु को भी घर का एक जीवंत प्राणी माना जाता है और बराबरी का हक दिया जाता है| और जो भी आपके साथ आपकी सास ने किया उसके लिए मैं जिम्मेदार कैसे? माफ करना माँ जी पर अब नहीं लगता मुझे कि मै आपसे कभी सहज रिशता निभा पाऊंगी| "कहते हुए सीमा बेहोश हो गई| सीमा को तुरंत अस्पताल ले जाया गयाऔर सीमा ने एक सुदंर सी कन्या को जन्म दिया| रिक्शे के रुकते ही कान्ता जी की तंद्रा भंग हुई| घर पहुँचते -पहुँचते उन्होंने एक संकल्प ले लिया था अब वे अपनी बहु के घर आने का इंतजार करने लगी|

आज कान्ता जी बड़ी खुश थी| उनकी बहु और पोती घर जो आने वाली थी| पूरे जतन से उन्होंने पूरे घर को सजाया और तैयार होकर बच्चों का इंतजार करने लगी| कुछ समय बाद  बेटा और बहु दोनों घर पहुँचे| गाड़ी से उतरकर सीमा दरवाजे तक आई लेकिन उसके कदम आगे नहीं उठ पा रहे थे| उसे कान्ता जी कि कही हर बात याद आ रही थी| भारी मन से सीमा ने घर में प्रवेश किया पर सजे सवरे घर को देखकर उसे आश्चर्य हुआ| अमर ने भी माँ से पूछा, "अरे माँ! क्या बात है , घर तो बहुत सुदंर सजाया है आपने| क्या कोई आने वाला है?"

"नहीं बेटा, यह घर मैंने अपनी बहु और पोती के स्वागत में सजाया है| "उन्होंने सीमा के सिर पर प्यार से हाथ फेरते हुए कहा, "मानती हूँ मैंने जो किया वो गलत था| तुम चाहे अमर की पसंद हो लेकिन तुम में वो सभी गुण है जो मैं एक बहु में चाहती थी| पर उन्हें अनदेखा कर बस एक ही बात सोचती रही की मेरे बेटे की बहु खुद नहीं चुन पाई| पर इसमें भी तुम्हारा कोई दोष नहीं| तुम्हारा मन तो मैंने बहुत दुखाया है लेकिन हो सकें तो पिछला सब भूल कर एक नयी शुरुआत करना| तुम्हें कभी कोई तकलीफ होने नहीं दूँगी" कहते-कहते उनकी आँखें भीग आई और गला रूध गया|

"अरे माँ जी आप रोईए मत, मैंने आपको हमेशा अपनी माँ समान माना है और माँ बेटी में तो बहस होती रहती है| अब संभालिए अपनी पोती को क्योंकि इसकी परवरिश आपसे बेहतर और कोई कर ही नहीं सकता" कहते हुए सीमा ने अपनी बेटी को कान्ता जी की गोद में लिटा दिया|

"हाँ, हाँ अब तो भाभी आ गई है तो हमारा तो पत्ता कट गया बेटीयों की पदवी से| चलो कोई नहीं हम तो बुआ बनकर ही आया करेंगे|"
"अरे दीदी आप?" बेटीयों को देखकर कान्ता जी का भी चेहरा खिल गया| घर में खुशियों की लहर लहराने लगी| सभी मिलकर नन्हीं गुड़ियाँ के नामकरण की तैयारी में मग्न हो गएऔर घर फिर से खुशियों से महकने लगा| अमर दूर से सभी को खुश देखकर ईश्वर को धन्यवाद देते हुए मुस्कुरा उठा|

धन्यवाद

अनामिका अनु

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