कुछ भी तो नहीं भूली मैं

कुछ भी तो नहीं भूली मैं

जीवन में कई ऐसी घटनाएँ हैं जो आपके अतीत में घटित हुई परन्तु आज आपके वर्तमान में भी आप का दामन थामे हैं। 

मेरा बचपन मुझे अच्छी तरह से याद है - वे गलियाँ, बेर-अमरूद के पेड़ , गली के सभी दोस्त, माँ सा प्यार करने वाली आंटियाँ, चाचा-ताया की धमकाती और कभी प्यार लुटाती वे आँखें , भाई-बहन का मिल बाँटकर -लड़ झगड़ कर खाना, रिश्तेदारों की हँसती-रुलाती चिट्टियाँ…. वाह ! कुछ भी तो नहीं भूली । सभी कुछ जैसे पुन: जीवंत हो गया। 

इन सबसे ऊपर याद है मुझे वह गेट से पुकारती मेरे डैडी की आवाज़ …..सीमा , रीना (मेरा व मेरी बहन का घर का नाम) 

ओहहहहह…...कितनी सुखदायी थी वह आवाज़। 

अक्सर डैडी कहा करते थे कि तुम दोनों को देख लेता हूँ तो मेरी सारी थकान मिट जाती है , वही हाल  हम दोनों का भी था । डैडी की आवाज़ सुनते ही जैसे हमारी सारी इच्छाएँ पूरी हो जाती थी । लगता था जैसे हर वो चीज़ जो हम अभी माँगना चाहते थे,वह मिल गई हो ।

डैडी चाहे जब घर आएँ पर  उनका एक हर रोज़ किया जाने वाला काम था ….हम दोनों को अपनी साइकिल पर बिठा बाज़ार से चीज दिलवाने- खिलाने जाना ।

जाने वह स्वाद कहाँ चला गया…….. 

साइकिल पर बैठकर हम जब जा रहे होते थे तो डैडी का दीवार पर लिखे वाक्यों को पढ़ते जाने के लिए कहना । जैसाकि दीवारों पर पहले बहुत विज्ञापन छपे होते थे । मात्राओं का ज्ञान , बड़े-बड़े अंकों की संख्या पढ़ना यूँ ही सिखाया था डैडी ने हमें । 

घर आकर वही संख्याएँ , वही वाक्य पूछना यही माध्यम था शायद जैसे पढ़ाने का । आज जब भी अपने बच्चों के साथ स्कूटी पर या गाड़ी में कहीं भी जा रही होती हूँ तो अपने डैडी को साथ चलता महसूस करती हूँ । आज दुर्भाग्यवश वह मेरे साथ नहीं है परंतु फिर भी घर से निकलते हुए जैसे उनकी कमी महसूस नहीं होती। दीवारों पर कुछ लिखा हुआ पढ़ते हुए जाती हूँ तो लगता है जैसे डैडी कह रहे हैं कि पढ़ते-पढ़ते चलना ,कुछ नया सीख जाओगी । मैं भी बच्चों के साथ जाते हुए कुछ न कुछ चर्चा करती रहती हूँ । डैडी का ज्ञान भी जीवित  है और उनका ज्ञान सिखाने का अंदाज़ भी ।

आज मेरे डैडी मेरे साथ नहीं है । कुछ समय पहले उनका एक दुर्घटना में देहांत हो गया था । आज भी जब मैं घर से बाहर निकलती हूँ तो शायद मेरे डैडी की परछाई भी मेरे साथ चल पड़ती है ।

धन्यवाद

Madhu Dhiman

Pink columnist-Haryana

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