क्यूं एक पुरूष ही औरत के लिये सब कुछ होता है ?

क्यूं एक पुरूष ही औरत के लिये सब कुछ होता है ?

नहीं नहीं मां मुझे अभी पढ़ना है खुद की पहचान बनाना है अभी नहीं करनी है मुझे शादी !  पर नेहा की मां, नेहा की बात को कहां मानने वाली थी क्योंकि लड़का अच्छा भला एक ऑफीसर था परिवार के सब लोगों ने हामी भर दी यह कहकर कि अरे लड़के वालों ने खुद नेहा को पसंद किया है | कमी क्या है समीर के घर पर ? अच्छा खासा कमाता है खुद का बंगला है मोटर है गाड़ी है और तो और जमीन जायजाद भी बहुत है | एक सुखी जीवन के लिये क्या चाहिये है भला ? मां ने,  नेहा को अपनी उम्र का हवाला दिया और फिर से कहा देख बेटा अपने रहते मैं, तेरे हाथ पीले कर देना चाहती हूं पिता का साया भी नहीं है तेरे सर पर | सिर्फ दो भाई हैं तुम्हारे , वो भी अपनी अपनी ग्रहस्थी में लीन हैं कल को यदि भगवान न करे मुझे कुछ हो गया तब क्या होगा तुम्हारा .... ? मां की बातों को अब नेहा नकार न सकी और जल्द ही नेहा व समीर की सगाई हो गई फिर शादी |                                                                       

नेहा पढ़ने में होशियार थी उसका ग्रेजुएशन बस कम्प्लीट हुआ था वह पीजी की डिग्री नहीं ले पाई थी | उसने पढ़ने की इच्छा जाहिर की थी पर समीर ने यह कहकर मना कर दिया था कि क्या करोगी आगे पढ़कर जो भी है जितना है काफी है ? नेहा अपनी इच्छा को मन में दबा लेती है उसका स्वभाव शांत था व वह देखने में सुंदर थी कभी नेहा किसी बात को लेकर कोई शिकायत नहीं करती और इस तरह से नेहा के सुखद पांच साल बीत जाते हैं मायके में नेहा की मां स्वर्गसिधार जाती हैं | नेहा अब एक बेटी की मां बन जाती है पर अचानक से कुछ ही महींनों बाद नेहा के होश उड़ जाते हैं यह जानकर कि समीर की जिदंगी में उसका पहला प्यार वापस लौट आया है और समीर अपने पहले प्यार के साथ ही रहना चाहता था जिसका नाम था साधना .... नेहा करती भी तो क्या करती ? समीर ने खुद उससे कहा कि हम समझौता कर लेते हैं नेहा ! यह घर मैं तुम्हारे नाम कर देता हूं आधी जायजाद भी और बेटी भी तुम्हारे पास रहेगी बस मुझे साधना के पास रहने दो |                                                                     

नेहा के मायके में भी कोई सुनने वाला न था और नेहा अब अपने स्वाभिमान के साथ जीना चाहती थी समीर के फैसले ने उसे अंदर से तोड़ दिया था वह सिर्फ अपनी बेटी की वजह से चुप थी क्योंकि वह एक मां भी थी वह हर हाल में बेटी की परवरिश खुद करना चाहती थी | उसने बिना किसी शिकायत के बेटी का हाथ थामा और चली गई वह अपनी यादों को लेकर व समीर को तलाक देकर | इस घर से जाने के बाद नेहा अपनी बेस्ट फ्रेंड अवनि के घर गई | अवनि एक अच्छी कंपनी में जॉब करती थी उसने भी समीर को लेकर नाराजगी जताई तब नेहा ने कहा जाने दो न अवनि पर आज इस नई राह ने साबित कर दिया कि पहले बेटी को उसके पैरों पर खडा़ होंने दो बाद में उसकी शादी की जाये | जाने क्यों हमारा समाज सोचता है कि एक पुरूष ही औरत के लिये सब कुछ होता है ? जबकि यह गलत है | इतना सोचकर अवनि निकलती है एक नई राह पर जहां बहुत मुश्किलों के बाद उसे नौकरी मिलती है और वह नौकरी करते हुए अपनी बेटी की परवरिश करने लग जाती है |                                     

आगे चलकर अवनि ने तय किया कि पहले मेरी बेटी अपने पैरों पर खड़ी होगी और जब उसकी मर्जी होगी वह शादी करेगी नहीं तो नहीं ? मैं नहीं मानती कि एक पुरूष ही औरत की पहचान बनता है जबकि सत्य यह है कि एक औरत दूसरों को पहचान देने खातिर खुद की पहचान खो देती है | यही सोचकर अवनि बड़ी जतन से अपनी बेटी की परवरिश करती है व पुरानी बीती बातों को धूमिल करने की कोशिश में लग जाती है |                                                                                               

धन्यवाद                                                                 

रिंकी पांडेय

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