लिखे जो ख़त तुझे

लिखे जो ख़त तुझे

प्रिय केशव,

आज हमारे बेटे के दसवें जन्मदिन पर मैं तुम्हें यह ख़त लिख रहीं हूँ।पर यह आख़िरी है।इसके बाद यह भूमिका तुम्हारा बेटा आरव
निभाएगा। अब वह काफी बड़ा हो गया है।काफी कुछ समझने भी लगा है। कभी बहुत से सवाल करता है और कभी बिना कुछ कहे चुपचाप सा रहता है।अभी कल ही मैंने उसे बूरी तरह डांट दिया था वह बहुत जिद कर रहा था। उसे मोबाईल चाहिए इसलिये क्योंकि उसके बहुत से दोस्तों के पास भी है। पर मै उसे सिर्फ सुविधाओं के नाम पर गैजेट्स और बाईक और लग्ज़री देकर उसके साथ कभी न्याय नहीं कर पाऊंगी। मैं चाहती हूँ आरव हर चीज की कीमत समझे। हर चीज के अच्छे और बूरे पहलुओं की बारीकी को पकड़ पाएं। फिर चाहे वह गैजेट्स हो या रिश्ते। 

मैं नहीं जानती केशव मैं सही हूँ या नहीं।समय के इस मोड़ पर तुम्हारी सबसे ज्यादा ज़रूरत महसूस हो रही है। अब आरव जिदंगी के एक ऐसे मोड़ पर खड़ा है जहाँ से वह चुनना सीखेगा। माता-पिता होने के नाते हम हमेशा यही चाहेंगे कि वह सही का चुनाव करे। अच्छाई को चुने। मानवता को चुने। पर इन्हीं रास्तों पर कुछ पतली संकरी गलियां है जहाँ से वह गलत रास्तों पर भटक सकता है। बस मैं यह चाहती हूँ कि जब वह असमंजस में हो तो हमारी परवरिश ,हमारी सीख उसे सही रास्ता बताए। ताकि अगर वह भटका भी हो तो सही रास्ता ढ़ूंढ़ लें।

आज भी याद है केशव मुझे जब शादी के तीन साल बाद भी हम चाह कर भी माता-पिता नहीं बन पा रहे थे। तुम कितना छटपटाते थे । एक प्रेमी से पति बनने की भूमिका में भी तुम बहुत जल्दी में थे।और पति से पिता बनने में भी। पर न चाहते हुए भी हमें पाँच साल इंतज़ार करना पड़ा।मेरे माँ न बन पाने की वजह से जब मुझे जलती निगाहों और तानों का सामना करना पड़ा तो तुम बिना बताए डॉक्टर के पास अपना चेकअप करवाने गये थे। क्योंकि तुम यह मानने को तैयार ही नहीं थे कि कोई कमी मुझ में भी हो सकती है। तुम्हारी नज़र में ,मैं हमेशा सम्पूर्ण थी। हर तरह से। 

पर ईश्वर जैसे हमारी और हमारे प्यार की परीक्षा ही ले रहा था ।कमी न तुम में थी न मुझ में । फिर एक दिन हमें यह खुशख़बरी सुनने को मिली की मैं माँ बनने वाली हूँ। पाँच महीनों तक तुमने मेरा कितना ख्याल रखा। उन पाँच महीनों में मैंने अपनी जिदंगी के वो बेहतरीन पल जिएं जो मैं हमेशा अपनी यादों में महफूज रखना चाहूँगी। उम्र अपना असर दिखाएगी तब भी। याद है,कैसे उन दिनों मीठा खाने की कितनी तीव्र ईच्छा होती थी कि आधी रात को भी तुम कहीं से भी कैसे भी मीठाई का बंदोबस्त करते थे।

मुझे खुश रखने के लिये तुम वह सब करते थे जो इससे पहले तुमने कभी नहीं किया। फिर चाहे वह सुबह उठ कर मेरे लिये चाय बनाना हो या  रात को आकर मेरे साथ गली के नुक्कड़ से बर्फ का गोला खाना हो। तुम गजब के प्रेमी थे। ऐसे प्रेमी जिसकी कल्पना हर लड़की की कल्पना मे होती है पर हकीकत मे नहीं। पर तुम हकीकत के रूप मे मेरे साथ थे। पर उस से भी अच्छे तुम पति थे। और मुझे यकीन है पिता तुम इन सबसे बेहतर हो। 

तुम बेहद खुश थे कि तभी तुम्हारी पोस्टिंग कशमीर मे हो गई।तुम  नहीं जाना चाहते थे। पर तुम गये और न चाहते हुए भी मुझे यहाँ मेरी माँ के पास छोड़ कर गये। बहुत मुश्किल था इन पलों में तुमसे दूर रहना। चाह कर भी मैं अपना रोना नहीं रोक पाती थी।फिर तुम्हारी बाते याद कर हँसने की कोशिश करती थी।इस तरह करते नौ महीने गुज़रे और वह दिन भी आया जब आरव हमारी जिदंगी में आया। खुशी के साथ ही कितनी तड़प भी थी तुम्हारी आवाज में। लेकिन पिता बनने की खुशी मे तुमने होश नहीं खोया ।बस सही समय का इंतज़ार करने लगे। 
"

मैं आ रहा हूँ नीरा।मुझे कुछ दिन तुम्हारे और आरव के साथ बिताने का मौका मिल गया है।छुट्टी मंजूर हो गई है मेरी।बस दो दिन और इतंज़ार। फिर हम सब साथ होंगे। मैं अपने बच्चे को एक बार अपनी गोद में लेना चाहता हूँ। " बस यही थे तुम्हारे आखिरी शब्द। वो इंतज़ार दो दिन से दो महीने ,दो महीने से सालो मे बदल गया । न तुम आए और न हमारा इंतज़ार खत्म हुआ। 

आरव हर साल पूछता है,"मम्मी पापा कब आएंगे" और मैं कुछ कह नहीं पाती। तुम्हारा शव मिला होता तो मैं कह सकती थी कि तुम शहीद हो गए। पर न तुम मिले ,न कोई ख़बर और न ही...।। पर अब सोचती हूँ कि यह एक उम्मीद मेरे पास अब भी बाकी है कि तुम हो । कही तो हो।

शायद यह इंतज़ार थोड़ा और लम्बा हो। शायद कुछ बरस और कुछ बरस और करते यह इतंज़ार भी कट जाए।पर बस मेरी सांसे थमने से पहले आ जाना। एक बार मैं तुम्हारे साथ फिर से जी भर कर जीना चाहती हूँ। आरव के साथ हमारी कोई फैमिली फोटो भी नहीं खींच पाएं हम। तुम्हारे बिना तो हमारी फैमिली अधूरी है। आओगे न तुम इस फैमिली फोटो को पूरा करने।बोलो केशव ...आओगे न...।

तुम्हारे इंतज़ार में..।.
नीरा।
 

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