लेने के देने पड़े# यादगारपिकनिक#5दिन5ब्लॉग

लेने के देने पड़े# यादगारपिकनिक#5दिन5ब्लॉग

बात उन दिनों की है. जब हमारी नई शादी हुई थी..पति की पोस्टिंग दुर्गम कोल माइंस के इलाके में थी ..जहां मनोरंजन के सीमित साधन थे.. उस समय ना तो tv पर इतने चैनल्स होते थे, ना ओ टी टी प्लेटफार्म जैसी सुविधा थी,ना ही मोबाइल और इंटरनेट का जीवन में पदार्पण हुआ था.. ना मॉल घूमने का सुख था और न ऑनलाइन शॉपिंग का..


इतवार के दिन दोस्तों के साथ मौजमस्ती करना हो तो ..पिकनिक ही एकमात्र विकल्प रहता था..वो भी भोजन खुद पकाना पड़ता था...मेरे पति के 5मित्रों का ग्रुप था..हम सबकी नई नई शादी हुई थी..तो हम हर हफ्ते ,पिकनिक की नई नई जगह ढूंढते थे और कार तो किसी पास थी नहीं, अपनी अपनी बाइक या स्कूटर पर, सामान सहित लद फंद कर..पिकनिक के लिए निकल पड़ते..


एक बार किसी ने बताया कि पास में ही कोल माइंस के आगे एक पहाड़ी नदी है..जिसपर एक छोटा सा डैम भी है..और पास ही एक मंदिर भी,..फिर क्या था..हम पिकनिक प्रेमियों ने अगले हफ्ते ही वहां जा कर ..जंगल में मंगल मानने का प्रोग्राम बना डाला..


सन्डे की सुबह 9बजे हम घर से खाने पीने का सामान और किरोसिन ,स्टोव आदि लेकर अपने गंतव्य ले और निकल पड़े..लोगों से रास्ता पूछते हुए मंदिर तक पहुंचे.. वो एक छोटा सा,सुनसान पड़ा, शिव मंदिर था..रास्ता भी कच्चा और जंगलों के बीच से था..खैर किसी तरह उछलते कूदते 10:30तक वहां पहुंचे.. मंदिर से नीचे की ओर जंगल के बीच पहाड़ी नदी थी..वहां तक पैदल जाना था ,तो हमने अपने वाहन वहीं मंदिर के पास छोड़ दिए.. और समान सहित नीचे उतर गए..


नदी के किनारे पहुंचते ही हमारी सारी मेहनत सफल होती नजर आई..कल कल बहती पहाड़ी नदी.. हमें आमंत्रित करती सी प्रतीत हुई.. हम बैठने के लिए..कोई अच्छी सी जगह ढूंढ ही रहे थे...


तभी नदी में एक छोटी सी नाव..दूर से आती दिखाई दी..हम सबकी खुशी का ठिकाना न था.. हमने उसे आवाज दी तो..नाविक उसे किनारे ले आया..उसने बताया कि नदी उस पार का किनारा बहुत ही सुंदर है ..जहां हम रेत पर पिकनिक मना सकते हैं..हम उसकी बातों में आ गए..और नाव का किराया आदि तय करके.. हम सब नाव से नदी के उसपार पहुंच गए..नाविक हमसे कुछ पैसे लेकर शाम 4बजे तक आने का वादा करके वापस चला गया..उसने बताया कि उजाला रहते ही जंगल से निकल जाना ठीक रहेगा..अंधेरा होते ही जंगली जानवर नदी में पानी पीने आते हैं..हमने उसे आश्वस्त किया कि देर नहीं होगी..हम समय पर तैयार मिलेंगे..


5 _6 घंटे का समय मौज मस्ती और खाने पीने में कैसे बीत गया.. पता ही नहीं चला.. जंगल में वैसे ही जल्दी अंधेरा हो जाता है..सूरज की रोशनी जैसे ही मद्धम होने लगी..हमने अपना सामान समेटना शुरू का दिया.. पर अभी तक नाविक का पता नहीं था..उसकी नाव दूसरे किनारे पर बंधी नजर आ रही थी..इस लिए उम्मीद थी कि वो लौटकर जरूर आएगा..

पर जैसे जैसे समय गुजरता जा रहा था ..अंधेरा बढ़ता जा रहा था और हमारी घबराहट भी..एक तो जंगली जानवरों का खौफ और ऊपर से वो इलाका भी नक्सली था..अखबारों की कितनी ही हेडलाइंस हमारे जहन में घूमने लगीं.. सब एक दूसरे को हौसला देने में लगे हुए थे..पर अंदर से सभी डरे हुए थे..


नाविक के लौटने की उम्मीद धुंधला रही थी..हम सबने मदद के लिए पुकार लगानी शुरू कर दी..ताकि यदि कोई दूसरे किनारे पर हो तो सुनकर..हमारी कुछ मदद कर सके.. पर नतीजा सुखद नहीं रहा...कुछ सूखी लकड़ियां और पत्ते इकठ्ठा कर ...अंधेरा और डर भगाने के लिए हमने आग भी जला ली थी.. हम सब उस घड़ी को कोस रहे थे..जब नाविक की बात मानकर नदी पार की ..जैसे जैसे समय गुजरता जा रहा था..हम भयभीत होते जा रहे थे..


तभी नदी के दूसरे किनारे पर ले कुछ हलचल और आवाजें सुनाई दीं..टॉर्च की हल्की रोशनी भी दिख रही थी..हमें समझ नहीं आ रहा था कि हम खुश हों या परेशान..परेशानी इस बात की कि अगर वो नक्सली लोग हुए तो हमारा न जाने क्या हाल करेंगे..क्योंकि उनकी दरिंदगी की किस्से आए दिन सुनाई देते थे...


तभी अचानक एक सर्च लाइट की तेज रोशनी चमकी.. हमें पुलिस की वर्दी में हथियारों के साथ..कुछ लोग नदी की तरफ आते नजर आए..हम अब भी असमंजस में सांसे रोक बैठे रहे..लगा कि ये नक्सली ही हैं..उसी समय किसीने आवाज लगाई.."कौन हो तुम लोग ??"..शायद हमारी आवाज पास के गांव में किसी ने सुन ली थी..उसने ही पुलिस को खबर की..और फिर वन विभाग के सहयोग से हमें...नक्सली होने के शक में ढूंढा गया..क्यों कि हमारे वाहन भी उनको मंदिर के पास मिले थे..अतः पुलिस को लगा जरूर नक्सली होंगे..पर हम पुलिस को देखकर भी जब भागे या गोली नहीं चलाई तो उन्हें माजरा समझ में आ गया..


खैर . ..पुलिस के सहयोग से हम नदी के दूसरे किनारे पर वापस आ गए..और उन्हें सारी घटना विस्तार से बताई..जब नाविक की तलाश हुई तो पता चला कि वो हमसे पैसे पाकर..देशी शराब पीकर नशे में कहीं पड़ा सो रहा है..हमारे बारे में शायद उसको कुछ याद भी नहीं है...


जब रात गए थके हारे और घबराए हम पुलिस की सहायता से जंगल से बाहर निकले ..तो हमारी जान में जान आई.. हमारे नाम पते इत्यादि की जानकारी करके..पुलिस ने हमें फिर ऐसे दुर्गम और निषिद्ध क्षेत्र में..पिकनिक आदि न मानने की चेतावनी के साथ छोड़ दिया.. वो खतरनाक पिकनिक हमारे जीवन की यादगार घटना बन गई..जिसको यादकर आज भी रोंगटे खड़े हो जाते हैं...

नीलम राज


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