मां का दर्द

मां का दर्द

आंचल कहां मर गई....छत पर जा जाकर कपड़े उतार ला, इतनी गर्मी पड़ रही है कि कपड़े भी पापड़ बन जाए। आशा जी ने झल्लाकर कहा...बेचारी आंचल अभी अभी तो सारे काम निपटा कर थोड़ा आराम करने गई थी और सासू मां का सायरन बजना शुरू हो गया।बेचारी उठी और कपड़े लाकर रख दिए और दोबारा लेट गई।


उसके बगल में दो महीने की बेटी रूही भी गहरी नींद में सोई हुई थी। अभी अभी आंचल लेटी ही थी कि ....अरे बहू चाय कब मिलेगी, शाम होने को है और अभी तक चाय भी नसीब नहीं हुआ है मुझ‌ बुढ़िया को....आंचल समझ गई थी कि अब वो आराम नहीं कर पाएगी, इसलिए उठी और रसोई में चली गई। चाय बनाकर वो रात के खाने की तैयारी में लग गई। कुछ देर बाद ही बेटी की रोने की आवाज सुनकर आंचल दौड़ते हुए कमरे में है।वो वहीं बैठ बेटी को दूध पिलाने लगी कि तभी सासू मां का सायरन फिर बजने लगा,अरे बहू अब रात होने को है मेरा बेटा ऑफिस से आता ही होगा और ये महारानी अभी तक बच्चे की सेवा में ही लगी है।सास की बात सुनकर आंचल की आंखें भर आईं, वो बेटी को बेड पर छोड़ कर अपना काम करने चली गई। हां वो बीच-बीच में आकर बेटी को देख जाती।


आंचल अभी दो महीने पहले ही मां बनी है। सास और पति नाराज़ चल रहे हैं क्योंकि आंचल ने बेटी को जन्म दिया है। बेचारी आंचल बेटी के जन्म के बाद उसके शरीर को आराम भी नहीं मिला , बच्चे के जन्म के तुरंत बाद वो घर के सारे काम कर रही थी।सास आशा जी किसी ना किसी बहाने उसे काम में लगाती रहती, पति का साथ नहीं था इसलिए आंचल सास से कुछ नहीं कह पाती ‌। आंचल बेटी को मन भर के गोद भी नहीं ले पाती थी क्योकि सास किसी ना किसी बहाने उससे काम लेती रहती। आज भी रोज़ की तरह आशा जी वही कर रही थी।पति के आने के पहले आंचल ने सब्जी बनाकर रख दी थी ,बस रोटी बनानी बाकी थी जो गरमा गरम निकाल कर परोसी जाती।


मां , बेटा दोनों खाने पर बैठे थे , आंचल रोटियां सेंक रही थी। कमरे से बच्ची की रोने की आवाज़ लगातार आ रही थी। दोनों मां, बेटा चुपचाप खाना खाने में मग्न थे। वे बच्चे की रोने की आवाज़ को नजरंदाज कर रहे थे।अब तो आंचल के सब्र का बांध टूट ही गया था। आंचल सास के सामने खड़ी हो गई, आंचल ने भले मुंह से कुछ नहीं कहा हो लेकिन "उसकी आंखों से निकलते आंसू उसके दर्द को बयां कर रहे थे.." एक मां का दर्द.....भरी आंखों से आंचल कमरे में गई और दरवाजा बंद कर बेटी को दूध पिलाने लगी।बहुत देर बाद भी जब वो कमरे से बाहर नहीं आई तो सास की सायरन फिर लगी बजने। इस बार अंदर से आंचल की आवाज आई... वो गुस्से में रो रही थी ,कह रही थी.....मम्मी जी आज मैं इस कमरे से बाहर नहीं निकलूंगी।


आप और आपका बेटा अपने लिए खुद रोटी बना लीजिए, मेरी बेटी भूख से रोएगी बिलबिलाएगी और मैं आप सबके लिए रोटियां सेकूंगी।कल से एक काम वाली ढूंढ लीजिए जो आप सबके लिए खाना बनाए और आप सबकी सेवा करे।मै आपके बेटे कि उपभोग की वस्तु नहीं बल्कि एक बेटी की मां भी हूं। आप दोनों हम मां बेटी के साथ दुर्व्यवहार नहीं कर सकते। अब मैं आप दोनों का व्यवहार बिल्कुल बर्दाश्त नहीं कर सकती । मै नहीं चाहती कि जो आज मैं बर्दाश्त कर रही हूं ,कल उसका खामियाजा मेरी मासूम सी बेटी को भुगतना पड़े। इसलिए मैं कल से आराम करूंगी , क्योंकि मुझे आराम की सख्त जरूरत है‌ और हां आप दोनों ने मुझे ज्यादा परेशान किया तो मैं अपनी बेटी को लेकर ये घर छोड़कर चली जाऊंगी।आंचल की बात सुनकर दोनों मां बेटा एक-दूसरे को देखने लगे, बात और बिगड़ जाए ये सोचकर दोनों चुपचाप बैठकर खाना खाने लगे।अन्दर आंचल बहुत खुश थी क्योंकि आज उसने अपनी बेटी के लिए ग़लत के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाना सीख लिया था।

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