मां-बाप का दर्द कोई ना समझे....!!

मां-बाप का दर्द कोई ना समझे....!!

मां कहा किसी को समझ में आती है। जब बच्चे -बाप की व्यथाछोटे होते हैं उनके पीछे ही हमारा सारा समय चला जाता है। समय के साथ मां-बाप की अपनी इच्छा, अपनी पसंद ,अपनी जिंदगी सब किसी एक संदुक में बंद होके रह जाती है।वो बस अपने परिवार वालों के लिए जीते है ।उन्हीं के खुशी में अपनी खुशी चुन लेते है। उनके सपनों को अपना सपना समझ कर उन्हें उड़ना भरने के काबिल बनाते है।पर मां-बाप के दर्द की व्यथा कोई नहीं समझ पाता है।ये एक मां-बाप की नही वो हर मां-बाप की कहानी है जो अपने परिवार के खातिर जीते है.....।।

"मैने इसे खुद महसूस किया है अपने आस पास इसे होते देखा है।" रितिका ने अपनी सहेली कविता को कही...

रितिका और कविता दोनों बचपन के दोस्त नही है। वो दोनों एक दूसरे के दर्द के दोस्त हैं। दोनों की मुलाकात वृद्ध आश्रम में हुई है।तब से दोनों एक-दूसरे के दोस्त बन गए हैं। दोनों की उम्र लगभग एक जैसी ही है। और जीवन ने जो घाव दिए हैं वो दोनो को एक समान दिए हैं।

रितिका की शादी रितेश से हुई थी। शादी के कुछ ही वर्षों के बाद ही  रितिका और रिश्ते को जुड़वां बच्चे हुए एक लड़का एक लड़की। दोनों बहुत खुश हुए थे अपने बच्चों के जन्म से।रितेश का कपड़ों का व्यापार था। रितेश और रितिक अपनी गृहस्थी में बहुत खुश थे। दोनों बच्चों की परवरिश भी बहुत अच्छे से हो रही थी। हंसता खेलता भरा-पूरा परिवार था। रितेश ने कई बार रितिका को कहा तुम भी थोड़ा व्यापार में हाथ बंटाने आ जाओ। तुमने तो MBA भी किया है। आज व्यापार की जो तरक्की है वो तेरी वजह से है। तेरी सूझ बूझ से और तेरे व्यापार करने के तरीकों से आज हमारा व्यापार इतनी ऊंचाई पर पहुंचा है।पर रितिका ने रितेश से कहा नही अभी बच्चे छोटे हैं उनको मेरी जरूरत है। माना की सुझाव मेरे है पर मेहनत तो आप की है। रितेश ने रितिका के हां में हां मिलाई।

पर समय का ऐसा पहिया घुमा कि रितिका की जिंदगी दुखों से भर दी। रितेश का अचानक दुनिया से चले जाना मानो रितिका की दुनिया ही तबाह हो गई। रितिका के दोनों बच्चे बेटा रवि और बेटी रीति दोनों 16 साल के थे
। एक अकेली औरत जिसे अपने दोनों बच्चों की भी परवरिश करनी है और अपने बच्चों को अच्छा भविष्य भी  देना है और अपने व्यापार को भी संभालना है ।जो उस के पति रितेश ने अपने मेहनत और लगन से खड़ा किया है। समय के साथ रितिका ने अपने दर्द को अपने सीने में छुपा कर अपनी पूरी मेहनत और लगन से अपने व्यापार और अपने दोनों बच्चों को उज्जवल भविष्य दिया ।रवि ने अपनी एमबीए की पढ़ाई पूरी कर ली और एक मल्टीनेशनल कंपनी में नौकरी करने लगा। रीति ने भी अपनी पढ़ाई पूरी कर ली। अपनी मेहनत का परिणाम देख रितिका बहुत खुश हुई उसने रीति की शादी एक एन आर आई  व्यापारी से की जो कि विदेश में रहता है। शादी के बाद रीति अपने पति के साथ विदेश में रहने लगी। रवि को भी अपनी कंपनी की ओर से विदेश जाने का मौका मिला पर कुछ आर्थिक कारण की वजह से वह जा नहीं पा रहा था।

रितिका की इच्छा  थी कि रवि अपने पापा का कारोबार संभाले। पर रवि को इस कारोबार में कोई दिलचस्पी नहीं उसका कहना था मुझे विदेश जाना है ।वहां रहना है यहां कुछ भी नहीं है ।जितना इस कारोबार से यहां कमा लूंगा उससे दुगना मुझे विदेश में मिलेगा सो मुझे विदेश आना है पर रितिका इसके लिए तैयार ना थी।

उम्र के इस पड़ाव में रितिका को अपने बेटे की जरूरत है ।पर रवि को सिर्फ और सिर्फ अपना ही स्वार्थ दिख रहा था। पैसा और शोहरत ऐसी चीज है जो किसी के भी ईमान को हिला सकती है। जब रवि ने रीति को अपनी विदेश जाने की बात कही तो उसने कहा मां का ख्याल कौन रखेगा।तब रवि ने कहा तुम आ जाओ और मां को अपने साथ ले कर जाओ।तब रीति ने बिना हिचक किए कहा मुझे अपनी जिंदगी जीनी है। तुम बेटे हो मां तुम्हारी जिम्मेदारी है मेरी नही.…तब रवि ने कहा तो ठीक है मां पापा की दौलत पर मेरा हक है ।मैं सब बेच कर विदेश में सेट हो जाऊंगा।तब रीति ने उस दौलत पर मेरा भी हक है तुम्हें जो करना है करो पर मुझे मेरा हिस्सा मिल जाना चाहिए। पैसे की लालच और अपने स्वार्थ के लिए रवि ने रितिका से घर, व्यापार सब के पेपर पर हस्ताक्षर लेकर सब बेच कर विदेश चला गया। और अपनी मां के लिए नया ठिकाना वृद्ध आश्रम ढूढ के हमेशा के लिए विदेश चला गया।जब तक रितिका को कुछ समझ में आता बहुत देर हो चुकी थी।कविता की भी कहानी कुछ ऐसी ही है।

हम ये नही कह सकते कि सिर्फ बेटे ही इन सब के लिए जिम्मेवार होते हैं कभी कभी बेटीयां भी होती है। रीति जैसे लोग जो सिर्फ अपना स्वार्थ देखते हैं। एक क्षण के लिए भी रवि और रीति को अपने मां-बाप के द्वारा किए गए त्याग का ख्याल नही आया। काश अपने स्वार्थ के लिए लोग अपने माता-पिता का त्याग नही करते तो आज कोई मां-बाप  वृद्ध आश्रम में नही होते..????

धन्यवाद
आपकी अपनी
सीमा सिंह ????????

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