मां की ममता

मां की ममता
  • डिलीवरी के बाद जब नर्स ने मेरी बेटी को गोद में दिया तो मैं उसे देख खुशी से खिल उठी। कुछ घंटे पहले तक जहां मैं असहनीय प्रसव पीड़ा में छटपटा रही थी। वह दर्द उसे बाहों में लेते ही मानो चरम सुख में परिवर्तित हो गया हो। सच कहा गया है कि मां बनने का सुख हमारे जीवन का सबसे बड़ा वरदान है और मैं उसी सुख का फिर से अनुभव कर रही थी। मेरी बेटी अधखुली आंखों से इधर-उधर टुकुर टुकुर देख रही थी और प्रतिक्षण अपने चेहरे के भाव बदल रही थी। मैं कभी प्यार से उसके माथे को चूमती, कभी उसे छाती से लगाती।

यह सब देख मेरे साथ वाले बेड पर लेटी हुई महिला ने मुझसे पूछा दी”लड़का है क्या?” “नहीं लड़की है।” मैंने अपनी बिटिया की सिर पर प्यार करते हुए कहा । अच्छा “पहला बच्चा है यह आपका!” वह बोली। अ‌रे नहीं दूसरा है ।तो पहला लड़का होगा दीदी। उसने बात आगे बढ़ाई। नहीं पहली भी लड़की है। मैने कहा  ।

उसके चेहरे के भाव बदल गए और बड़े रूखे स्वर में देखते हुए बोली “फिर भी आप इसे इतना प्यार कर रही हो।” मैं हैरानी से उसके चेहरे के बदलते भाव देखती रह गई। फिर मुस्कुराकर बोली “बहन जी मां कभी अपने बच्चों को बेटा या बेटी देखकर अपनी ममता लुटाती है क्या! उसके लिए तो दोनों ही बराबर है। क्योंकि दोनों ही उसके अंश है और दोनों के जन्म पर ही उसे समान पीड़ा सहनी पड़ती है।” यह कह मैं फिर से अपनी नन्ही परी की  अठखेलियां का आनंद लेने लगी।

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