माघमेला (कल्पवास): Blog post by Maya Shukla

माघमेला (कल्पवास): Blog post by Maya Shukla

पुरानी मान्यताओं के अनुसार जब देवता अमृत का घड़ा लेकर दानवों से बचाते हुए भाग रहे थे तो उसकी बूंदे धरती पर चार जगहों पर छलकी थीं उज्जैन, नासिक, हरिद्वार और प्रयागराज। इसलिए इन चार जगहों पर कुंभ (कुंभ का अर्थ है घड़ा) मेला लगता है जोकि प्रत्येक बारह वर्ष में आता है।

ऐसी मान्यता है कि इस मेले के दौरान पवित्र नदियों क्षिप्रा, गोदावरी और गंगा में स्नान करने से मरणोपरांत मोक्ष की प्राप्ति होती है।


गंगा न केवल एक नदी हैं अपितु भारत की सांस्कृतिक जीवन रेखा हैं। इसके चारों ओर भारत जीता है और गंगा हज़ारों भारतीयों की जीविका का भी साधन हैं।


इलाहाबाद (वर्तमान में प्रयागराज) प्रतिवर्ष माघ के महीने में 'माघमेला' लगता है। यह मेला पूरे एक महीने तक चलता है। आस - पास के राज्यों से और उत्तर प्रदेश के लोग यहां कल्पवास करने आते हैं। कल्पवास का वर्णन हिंदी की महान लेखिका महादेवी वर्मा ने भी अपनी कहानी "ठकुरी बाबा" में किया था।


कल्पवास में लोग एक महीने के लिए अपना घर छोड़कर गंगा के किनारे पर्णकुटी बनाकर या तंबू गाड़कर रहने आते हैं। कल्पवास करने वाले लोग वो ही होते हैं जो अपने गृहस्थ जीवन के कार्यों से निवृत्त हो चुके होते हैं और भगवान की शरण में अपना शेष जीवन काटना चाहते हैं।


माघमेले (कल्पवास) में भोर में (4: 00 बजे) गंगा मैया में डुबकी लगाने के साथ दिन शुरू होता है और फिर दिन भर भजन - कीर्तन, पूजा - पाठ और भंडारे का जगह - जगह आयोजन रहता है।


उत्तर प्रदेश में माघ के महीने में कड़ाके की सर्दी पड़ती है, ये करोड़ों लोगों की आस्था ही तो है कि फ्रीज के जैसे ठंडे गंगा जी के पानी में लोग बिना हिचकिचाए आस्था की डुबकी लगाते हैं।


मकर संक्रान्ति, मौनी अमावस्या और बसंत पंचमी के दिन शाही स्नान होता है जिसमें विभिन्न मठों और अखाड़ों के साधु - संत स्नान करने आते हैं। इनकी भव्य सवारी देखते ही बनती है।


माघमेला में नागा साधू (अघोरी) भी बड़ी संख्या में आते है और ये भी आकर्षण का केंद्र होते हैं। वैसे तो अघोरी अपनी गुमनाम और रहस्यमय जिंदगी के लिए जाने जाते हैं पर माघमेले में न जाने कहां से ये लाखों की संख्या में दिखाई पड़ते हैं और मेला समाप्त होते ही इनके दर्शन दुर्लभ हो जाते हैं।


माघमेला न केवल भारतीयों के लिए आकर्षण का केंद्र है बल्कि विदेशी सैलानी भी इस मेले का लुत्फ उठाने भारी संख्या में आते हैं और आस्था के संगम में डुबकी लगाते हैं। कुछ तो सांसारिक मोहमाया छोड़कर गंगा तट पर ही बस जाते हैं और ईश्वर की भक्ति में लीन हो जाते हैं।




संगम तट पर तीन नदियों (गंगा,यमुनाऔर सरस्वती) का मिलन होने के कारण संगम घाट का स्नान पवित्रतम माना जाता है।


डिस्कवरी चैनल भी कल्पवास और माघमेले में आए लोगों की आस्था, विश्वास और उत्साह को देखकर अचंभित है।


करोड़ों लोग इस माघमेले के दौरान गंगा में स्नान करने आते हैं क्योंकि उनका ऐसा विश्वास है कि "गंगा के एक बूंद जल मात्र से उनके सभी रोग - दोष मिट जाते हैं और मरने के पश्चात उन्हें मोक्ष की प्राप्ति होगी।"

जय गंगा मइया!!



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