महिला सशक्तिकरण महज़ बातें हैं

महिला सशक्तिकरण महज़ बातें हैं

समाज में महिला सशक्तिकरण सच में हुआ है, या बातों में ही वर्णित होता है? ये कह नहीं सकते। हम खुद को 21वीं सदी की विचारधारा वालें समझते तो है पर क्या सच में विचारों से आधुनिक बनें है?

जिस तरह से आए दिन महिलाओं के साथ हो रहे अत्याचार और शोषण के किस्से सुनने को मिलते है, उस हिसाब से महिलाएं आज भी आज़ाद नहीं। आज भी अपना हक मांगने के लिए लड़ना पड़ता है, या कानून का सहारा लेना पड़ता है। क्या मानसिकता रहती होगी महिलाओं को प्रताड़ित करने वालों की? शायद स्त्रियों को कमज़ोर समझते है, पितृसत्तात्मक परंपरा का अनुसरण या एक ऐसी सोच की स्त्री को तो एक दायरे में रहकर बंदीशों का पालन करते ही रहना और सहना है। क्यूँ कुछ मर्दों की सोच को जंग लग गया है जो सदियों से चली आ रही मानसिकता से मुक्त ही नहीं हो रहे।

हर क्षेत्र में घर परिवार हो, कामकाजी जगह हो या गली मोहल्ले और मार्केट हर एक की नज़र में स्त्री मतलब उपभोग की वस्तु, स्त्री मतलब कमज़ोर, स्त्री मतलब बेबस और लाचार। महिलाएं आज अंतरिक्ष तक पहुँच गई है, हर क्षेत्र में मर्द की बराबरी करती है। कई क्षेत्रों में तो मर्दों से भी दो कदम आगे निकल गई है फिर क्यूँ सही स्थान की हकदार आज भी नहीं।

कहने भर को उमा, लक्ष्मी और दुर्गा का रुप है स्त्री बाकी समाज की सोच में, समाज की नज़रों में नारी की बुद्धि पैरों की पानी में ही होती है। महिलाओं के मुकाबले मर्द सिर्फ़ तन से सशक्त होते है। सहने का और कुछ कर दिखाने का जो हौसला स्त्रियों में होता है वो पुरुषों में नहीं, इसलिए कुछ मर्द डरते है की हमारी स्त्री कहीं हमसे आगे न निकल जाए। स्त्री को दबाकर रखने में शायद यही मानसिकता वजह रहती होगी। उनको लगता होगा कहीं बराबरी का दर्ज़ा दे दिया तो खुद की कमियाँ उजागर हो जाएगी, घर के दरवाज़े पर लगा मर्द नाम का लेबल हट जाएगा या स्त्री महान बन जाएगी। अरे स्त्री को हल्का सा सम्मान चाहिए बस न वो आगे निकलना चाहती है न मर्दों को हराना चाहती है, सिर्फ़ अपने सही स्थान को पाना चाहती है।

जो भी हो पर कुछ महिलाओं के लिए वो आज़ादी की सुबह दूर बहुत दूर दिख रही है। वो सूरज मर्दाना अहं की आड़ लिए छिपा बैठा है जो नारी जीवन को रोशन करते अपने पहलू में बिठाकर बराबरी का स्थान देगा। सोच बदलो और स्त्रियों को सम्मानित करके उनके वजूद को समझो, उसके बाद महिला सशक्तिकरण का ढ़ोल पिटो।

भावना ठाकर \"भावु\" (बेंगुलूरु, कर्नाटक)"महिला सशक्तिकरण महज़ बातें है"

समाज में महिला सशक्तिकरण सच में हुआ है, या बातों में ही वर्णित होता है? ये कह नहीं सकते। हम खुद को 21वीं सदी की विचारधारा वालें समझते तो है पर क्या सच में विचारों से आधुनिक बनें है?

जिस तरह से आए दिन महिलाओं के साथ हो रहे अत्याचार और शोषण के किस्से सुनने को मिलते है, उस हिसाब से महिलाएं आज भी आज़ाद नहीं। आज भी अपना हक मांगने के लिए लड़ना पड़ता है, या कानून का सहारा लेना पड़ता है। क्या मानसिकता रहती होगी महिलाओं को प्रताड़ित करने वालों की? शायद स्त्रियों को कमज़ोर समझते है, पितृसत्तात्मक परंपरा का अनुसरण या एक ऐसी सोच की स्त्री को तो एक दायरे में रहकर बंदीशों का पालन करते ही रहना और सहना है। क्यूँ कुछ मर्दों की सोच को जंग लग गया है जो सदियों से चली आ रही मानसिकता से मुक्त ही नहीं हो रहे।

हर क्षेत्र में घर परिवार हो, कामकाजी जगह हो या गली मोहल्ले और मार्केट हर एक की नज़र में स्त्री मतलब उपभोग की वस्तु, स्त्री मतलब कमज़ोर, स्त्री मतलब बेबस और लाचार। महिलाएं आज अंतरिक्ष तक पहुँच गई है, हर क्षेत्र में मर्द की बराबरी करती है। कई क्षेत्रों में तो मर्दों से भी दो कदम आगे निकल गई है फिर क्यूँ सही स्थान की हकदार आज भी नहीं।

कहने भर को उमा, लक्ष्मी और दुर्गा का रुप है स्त्री बाकी समाज की सोच में, समाज की नज़रों में नारी की बुद्धि पैरों की पानी में ही होती है। महिलाओं के मुकाबले मर्द सिर्फ़ तन से सशक्त होते है। सहने का और कुछ कर दिखाने का जो हौसला स्त्रियों में होता है वो पुरुषों में नहीं, इसलिए कुछ मर्द डरते है की हमारी स्त्री कहीं हमसे आगे न निकल जाए। स्त्री को दबाकर रखने में शायद यही मानसिकता वजह रहती होगी। उनको लगता होगा कहीं बराबरी का दर्ज़ा दे दिया तो खुद की कमियाँ उजागर हो जाएगी, घर के दरवाज़े पर लगा मर्द नाम का लेबल हट जाएगा या स्त्री महान बन जाएगी।

अरे स्त्री को हल्का सा सम्मान चाहिए बस न वो आगे निकलना चाहती है न मर्दों को हराना चाहती है, सिर्फ़ अपने सही स्थान को पाना चाहती है।

जो भी हो पर कुछ महिलाओं के लिए वो आज़ादी की सुबह दूर बहुत दूर दिख रही है। वो सूरज मर्दाना अहं की आड़ लिए छिपा बैठा है जो नारी जीवन को रोशन करते अपने पहलू में बिठाकर बराबरी का स्थान देगा। सोच बदलो और स्त्रियों को सम्मानित करके उनके वजूद को समझो, उसके बाद महिला सशक्तिकरण का ढ़ोल पीटो।

भावना ठाकर "भावु" (बेंगुलूरु, कर्नाटक)

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