मैं अपने "बेटे" को आत्मनिर्भर बनाना चाहती हूँ

मैं अपने  "बेटे" को आत्मनिर्भर बनाना चाहती हूँ

सुबह से काम में व्यस्त स्नेहा को देखकर उसके पति मयंक से नहीं रहा गया। स्नेहा को किचन के सिंक के पास से हटाते हुए बोला, "बर्तन मैं धो देता हूँ, तुम और काम निपटाओंं।" स्नेहा को अपने पति पर बड़ा प्यार आया और वह बर्तन छोड़कर दूसरे काम देखने लगी। कितना अच्छा लगता है इस तरह मिलजुल कर काम करने से उसके होठों पर मुस्कुराहट तैर गई। तभी उसके ससुर जी का रसोईघर में आना हुआ। बेटे को बर्तन धोता देख बिफर उठे, "अरे ! ये क्या कर रहा है? ये तेरा काम है क्या?

मयंक ने समझाया , "कोई बात नही पापा घर का ही तो काम है।" तुरंत सासुजी को आवाज दी गयी , अरे !जरा यहाँ आकर देखों । सासु जी तुरंत बेटे को हटाने लगी ,  "हम मर गए है क्या" और एक तेज नजर स्नेहा पर डाली मानो उसने बहुत बड़ा अपराध कर दिया हो।

स्नेहा हक्कीबक्की सी सास ससुर को देख रही थी। बेटे को बर्तन धोता देख इतनी तकलीफ क्यों? यह घर का ही तो काम है। आज के जमाने में जब लैंगिक समानता को लेकर जागरूकता फैलाई जा रही है, तब एक पुरूष के बर्तन धोने पर इतना होहल्ला क्यों?

स्नेहा तो सभी तरह की आर्थिक और सामाजिक गतिविधियों में मयंक का साथ देती है। तो वह घर के कार्यों में साथ क्यों नही दे सकता। खैर स्नेहा ने अपने विचारों को विराम दिया कि कुछ नही बदलने वाला आगे की पीढ़ियों में ही शायद बदलाव देखने को मिले।

पर हद तो तब हुई जब एक दिन उसने अपने बेटे से खाने के बाद जूठे बर्तन उठाकर रखने को कहा तो ये बात भी उसके सास ससुर को हजम नही हुई।

उनके हिसाब से खाने के बाद सभी के जुठे बर्तन उठाना बहु का ही काम है। आज तक स्नेहा स्नेहवश ये सब करती आयी थी। अब उसे अपनी भूल का एहसास हुआ । वह अब अपने बेटे के लिए आशंकित हो गयी। क्योंकि वो अपने बेटे को इस पुरुष सत्तात्मकता से दूर रखकर समानता का पाठ पढ़ाना चाहती थी। वह चाहती थी कि वह अपने बेटे को घर के कामों में शामिल करे और वह जाने की कोई भी कार्य लैंगिक विशेष के लिए नही होता है।

पर रास्ता मुश्किलों भरा था। अगर वो उसे अपने जुठे बर्तन खुद उठाने को कहती तो उसकी दादी उससे पहले उठा लेती।और कोई घर का काम करने को कहती तो दादा दादी ढाल बन जाते की  वो अभी बच्चा है  और कौन सा उसे यही सब करना है। मयंक से कहती तो जवाब मिलता कि बड़ा होकर सीख जाएगा। पर सिखाया तो बचपन से जाता है।

फिर एक दिन स्नेहा ने आमना सामना करने की ठानी। उसने सास ससुर को अपना पक्ष बताया कि "मैं अपने बेटे को आत्मनिर्भर बनाना चाहती हूँ।"

ससुर व्यंग्यात्मक लहजे में बोले," घर के काम कराकर?"

स्नेहा बोली, " हाँ , घर के काम कराकर। काम, काम होता है चाहे घर का हो या बाहर का। आत्मनिर्भर होने के लिए शिक्षा तथा अन्य कौशलों की तरह घर के कामों में निपुण होना भी जरूरी है। जमाना बदल गया है। जिस प्रकार बेटियों को शिक्षा, करियर चुनने की आजादी देकर आत्मनिर्भर बनाने की जरूरत है वैसे ही बेटों को भी घर के कामों में शामिल करके ,उनका महत्व समझाकर आत्मनिर्भर बनाना जरूरी है। तभी लड़के- लड़कियों में एकदूसरे के प्रति आदर का भाव होगा।"

कुछ रुककर स्नेहा फिर बोली, " बड़ो के, बच्चों के कार्यों में अत्यधिक हस्तक्षेप से बच्चे जीवन के संघर्षों का सामना करने के लिए तैयार नही हो पाते हैं। आप लोगों से निवेदन है मुझे मेरे बेटे को आत्मनिर्भर बनाने में सहयोग दें।

पता नहीं वे लोग समझे कि नहीं पर स्नेहा अपनी कोशिश के लिए दृढ़संकल्प है।

दोस्तों क्या आपको भी लगता है कि बेटा हो या बेटी उन्हें बचपन से ही घर के कामों का महत्व समझाना चाहिए । और घर के काम आना भी आत्मनिर्भर होने के लिए ,एक महत्वपूर्ण अंग है। अपने विचार अवश्य दीजिएगा।

धन्यवाद।

प्रियंका फूलोरिया

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