क्या सासु माँ , मेरी माँ बन पायीं कभी ?

 क्या सासु माँ , मेरी माँ बन पायीं कभी ?

बात बस यहीं खत्म तो नहीं होती कि मैं बेटी न बन पायी 
पराये घर से आयी है ,ये बात बस एक तरफ़ा तो नहीं लगती 
मैं बेटी न बन पायी तो ,क्या सासु माँ , मेरी माँ बन पायीं कभी  
हज़ार गलतियों को मेरी सुधार कर ,कभी डांट कर 
कभी पुचकार कर , माँ आज भी अक्सर आँचल में छुपा लेती है 
फिर सासू माँ क्यों मेरी एक गलती की सज़ा, अपनी लम्बी चुप्पी से देती है !

बात बस यहीं खत्म तो नहीं होती कि मैं बेटी न बन पायी 
जीवन पर्यन्त मुझमें सुधार की गुंजाईश है , ये मैं भी जानती हूँ 
जीवन के काफी वर्ष एक परिवार में रहकर ,रातों रात एक अन्जान परिवार को अपनाना 
ये कोशिश शायद इतनी छोटी भी नहीं , थोड़ा हौसला थोड़ी उम्मींद का हक़ तो मैं भी रखती हूँ 

किसे क्या पसंद है खाने में , कौन कितने बजे चाय पीता है , किसकी क्या आदते हैं 
और किस बात से नए परिवार के किस सदस्य का दिल दुखता है 
अपनी पसंद नापसंद , अपना समय और अपना दिल परे रख 
सबसे पहले इस बात का ख्याल रखने लगती हूँ 
फिर भी जो मन को ना भाऊँ मैं , हर बात पर सवालों का कठघरा पाऊं मैं 
तो कैसे कह दूँ मैं बेटी न पायी , सासु माँ मेरी माँ ,
और ससुर जी भी तो मेरे पिता ना बन पाए। 

बहु से मत कहना , उसे मत बताना , घर की बात घर में ही रखना 
जब सुनु ये फुसफुसाहट ,तो आँखों के पोटुओं पर जमा होती नमी 
किसको दिखलाऊँ मैं , बनावटी मोह से ससुराल को कैसे अपनाऊँ मैं 
बात बस यहीं खत्म तो नहीं होती की मैं बेटी न बन पायी 
मैं बेटी न बन पायी तो ,क्या सासु माँ , मेरी माँ बन पायीं कभी ?

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