मैं भी माटी का पुतला हूँ !

अरे सारा दिन घर पर बैठे रहते हो ,कुछ करते क्यों नहीं क्या होगा भविष्य तुम्हारा , चार पैसे कैसे घर आएंगे ये कटाक्ष मुझे तबसे सुनाई दिए , जबसे मेरे स्कूल का बस्ता कंधे पर आया कभी हंसकर टाल दिया ,तो कभी अकेले कमरे में बैठ बस खुद को ही धिक्कार दिया

मैं भी माटी का पुतला हूँ !

अरे सारा दिन घर पर बैठे रहते हो ,कुछ करते क्यों नहीं
क्या होगा भविष्य तुम्हारा , चार पैसे कैसे घर आएंगे
ये कटाक्ष मुझे तबसे सुनाई दिए , जबसे मेरे स्कूल का बस्ता कंधे पर आया
कभी हंसकर टाल दिया ,तो कभी अकेले कमरे में बैठ बस खुद को ही धिक्कार दिया

छोटी बहन को हर पग पग पर दिया सुरक्षा भरा एहसास
अकेली वो कभी नहीं , कभी अपनी साइकिल पर बिठाया उसे
तो कभी उसकी वो स्कूटी पर पीछे बैठ गया
माँ का लाडला तू ही है , माँ बेटे को ज़्यादा लाड करती है
ये तारीफ़ कम ताना सुन मैंने मेरा पूरा बचपन बिता दिया !

स्कूल में अव्वल , कॉलेज में टॉपर हमेशा बने रहना
इन अंकों की दौड़ में , मैंने अपनी जवानी को पीछे छोड़ दिया
तुम लड़के हो लड़की की तरह क्या रोते हो
ये सुनकर अपने आंसुओं को हमेशा के लिए आँखों में छुपा लिया
जब वक़्त आया बहन की बिदाई का
अपने आसुओं को मैंने आँख की किरकिरी बता दिया।

मर्द हो तुम कमज़ोर नहीं हो सकते
इस बात ने मुझे अंदर ही अंदर तोड़ दिया
पिता बना एक बेटी का , दुनिया की सारी खुशियों ने
जैसे मुझसे नाता जोड़ लिया , वक़्त उसकी बिदाई का भी जल्दी आ गया
आँगन मेरा सूना हुआ ,पर……. तुम लड़के हो ,लड़की के जैसे क्यों रोते हो
ये आवाज़ कानों में गूंजी ,और मेरे आंसुओं ने आँखों में ही एक बार फिर दम तोड़ लिया।

एक बात आज मैं भी कहना चाहता हूँ , बस हंसना नहीं
जी भर कर रोना चाहता हूँ ,
दुःख अपनों के बिछड़ने का मुझे भी होता है
पत्थर या लोहे का नहीं बना मैं
मैं भी माटी का पुतला हूँ
शाम को घर लौटता हूँ तो माँ की याद मुझे भी सताती है
मगर खुश हूँ , उसकी हल्की सी परछाई
मुझे मेरी जीवनसंगिनी और बिटिया में नज़र आती है।
मुझे भी कभी कभी कमज़ोर होना अच्छा लगता है
कांधे पे रखकर सर किसी के थककर सोना बहुत अच्छा लगता है।

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