मैं हूं ना

मैं हूं ना

मैं ,कभी किसी “समस्या” या “संकटों” से घबराती नहीं। इसका कारण है, मेरा वैलेंटाइन, उसने मुझे शुरू से इतनी आजादी, प्यार, और अपनापन दिया ,कि मुझे कभी ऐसा नहीं लगा, कि किसी घटना या दुर्घटना में, “मैं” अकेली हूं।फिर चाहे वह अल्हड़पन की नादानियां हो या युवावस्था की गलतियां या फिर अधेड़ावस्था की ऊहापोह ।

हर मुसीबत से बाहर निकलने की एकमात्र वजह, सिर्फ मेरा वैलेंटाइन।ना कभी मैं पीछे हटी, ना कभी उसने मुझे पीछे हटने दिया ,हर वक्त सिर्फ एक ही आवाज मेरे कानों में टकराती ,उसे जो करना है, करने दो ,अगर कुछ गलती होगी, तो मैं सुधार दूंगी।

लेकिन यदि उसे दुख हुआ, तो कोई भी सुखी नहीं रहेगा, यह बातें मुझे हिम्मत बंधाते, कि कर जो करना है, लेकिन ऐसा कुछ भी ना करना,कि जो तुझ पर इतना विश्वास करें,  उसका विश्वास टूटे।युवावस्था में, मेरे आशिकों का फोन अटेंड करना और उन्हें बड़े प्यार से चाय पर बुलाना ,मेरा पीछा करने वालों को, मुझसे कहकर चाय पर बुलवाना बड़ा बेहतरीन अंदाज था ,मेरे वैलेंटाइन का, इन आशिकों से पीछा छुड़वाने का ।

वह कहती थी, यदि वह वाकई सीरियस होगा, तो आएगा ,नहीं होगा ,तो वहीं रुक जाएगा। और होता भी यही था, इसलिए कभी इन तथाकथित वैलेंटाइंस का खौफ नहीं रहा।शादी के लिए बढ़ती उम्र में, दुनिया वालों से अर्थात आस-पड़ोस रिश्तेदारों से निपटना, और घर में पापा का क्रोध झेलना, बस उन्हीं के बस में था। 

पापा अक्सर कहते, तुम्हारी लड़की इतनी सुंदर नहीं है, कि लोग उसके लिए बैठे रहेंगे , और वेलेंटाइन का यह कहना, कि चाहे जैसी भी हो ,मैं जब तक हां नहीं करूंगी ,जब तक वो नहीं बोलेगी, मुझमें यह साहस भर देता ,कि जब तक मैं ना चाहूं ,कोई मुझसे जबरदस्ती नहीं करा सकता।

और आज शादी के 18 साल बाद भी उतनी ही आजादी, प्यार ,और अपनापन शाय़द ही कोई वैलेंटाइन दे पाएगा, चाहे समस्या कैसी भी हो, बच्चों से संबंधित,या बीमारी ,या आर्थिक, धीरे से एक आवाज आती है। तू परेशान मत होना, “मैं हूं ना” तो ऐसा है मेरा वैलेंटाइन, जन्म के साथ भी, जन्म के बाद भी, और आज भी, और वह है -मेरी मां।

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