मुखौटा #खट्टी मीठी यादें#5दिन5ब्लॉग

मुखौटा #खट्टी मीठी यादें#5दिन5ब्लॉग

मैनें स्कूल में पढ़ाने के लिए .. नया नया ज्वाइन किया था.. पहला ही दिन था..स्टाफ रूम में कोई भी परिचित अध्यापिका नहीं थी.. मैं सबको अपना औपचारिक परिचय दे ही रही थी..तभी मेरी निगाह एक चेहरे पर जाकर रुक गई..मुझे वो चेहरा कुछ जाना पहचाना सा लगा..पर मैं असमंजस में थी.. पहले ही दिन इतना उत्साह दिखाना ठीक नहीं लगा.. उनसे कुछ और पूछूं ..इससे पहले ही असेंबली की घंटी बज गई..और सभी लोग स्टाफ रूम से बाहर निकलकर..प्रेयर हॉल की ओर चल दिए...


उसके बाद सभी अपने दैनिक टाइम टेबल के अनुसार कक्षाओं में व्यस्त हो गए..मुझे अभी मेरा टाइम टेबल नहीं मिला था..तो मैं वापस स्टाफ रूम में आकर बैठ गई..और अपने टाइम टेबल मिलने का इंतजार करने लगी..जो कि मुझे अकादमिक सेक्शन से मिलना था ....पहले पीरियड में लगभग सारा ही स्टाफ रूम खाली था..संगीत और आर्ट की टीचर ही खाली थीं..तो मैं उनसे ही स्कूल की जानकारी लेने लगी..


कुछ ही समय में पहला पीरियड ओवर होने की बेल बज गई..स्टाफ रूम में हलचल तेज होने लगी.. साथ बैठी अध्यापिकाएं अपनी कक्षा की ओर चल दीं..तभी सामने से वही अध्यापिका आती दिखाई पड़ीं ..जो मुझे कुछ परिचित दिख रही थीं..और उसी समय एकदम से मुझे याद आ गया..अरे!ये तो अपनी रमा दी हैं.. रमा दी यानि मनोरमा मिश्र दी..रमा मिश्रा नाम से वो पत्रिकाओं में लिखा करती थीं.. मुझसे एक साल सीनियर थीं और कालेज में खूब लोकप्रिय भी...तब वो मेरी ही कॉलोनी में रहती थीं.. बाद में उनके पापा का ट्रांसफर हो गया था..फिर उसके बाद उनका कोई पता नहीं था हमारे पास..


मैं उत्साहित होकर एकदम से खड़ी हो गई..और उनके पास जाकर हर्षातिरेक में बोली.".रमा दी !..आपने पहचाना मुझे में कॉलेज में आपकी जूनियर थी..हम एक ही रिक्शे से घर आते जाते थे."


मेरे अचानक इस तरह पहचाने जाने से वो थोड़ा विचलित सी दिखीं..एक फीकी हंसी के साथ मुझे पहचानने में असमर्थता जताई..मेरे उत्साह पर घड़ों पानी फिर गया..मैंने उन्हें याद दिलाने की कोशिश भी की..पर वो जैसे मुझसे कन्नी काटती सी दिखीं.. मानो जानकर भी अनजान बन रही हों.. मुझे जो पलभर खुशी मिली थी.. कि चलो कोई पुरानी पहचान का तो मिला..वो भी छू मंतर हो गई...


अब तक स्टाफ रूम में कई और टीचर आ चुकी थीं..अचानक वो मेरा हाथ पकड़ कर बोलीं.."चलो तुमको स्कूल घुमा देती हूं"..और बाहर गार्डन की ओर ले गईं.. मैं उनके इस अप्रत्याशित व्यवहार से जरा अचकचा सी गई थी..कहां तो अभी मुझे पहचान नहीं रही थीं..और अभी इतना अपनापन..


बाहर बगीचे की ओर जाते हुए ..एकांत पाकर उन्होंने कहा..देखो! यहां पुरानी जान पहचान दिखाने की कोई जरूरत नहीं है..और ना ही किसी को बताना कि मैं तुम्हारी सीनियर रह चुकी हूं..ना ही मेरे बारे में किसी को कोई और बात बताना... नहीं तो तुम्हारे लिए अच्छा नहीं होगा!!..उनका बात करने का अंदाज बहुत धमकी भरा था.. मैं हतप्रभ रह गई थी..केवल सिर हिला कर कहा.."जी दीदी!"


"दीदी विदी नहीं ..रमा मैडम कहो !!...और आगे से भी ऐसे ही बात करना.".वो एक के बाद एक हिदायत देती जा रही थीं.. एक तो पहला दिन और उस पर ये रूखा व्यवहार.. मेरे पास मुंडी हिलाने के अलावा कोई चारा नहीं था..


कहने की बात नहीं है.. मैं जब तक उस स्कूल में पढ़ाती रही..पलट कर उनकी तरफ देखा भी नहीं..हालांकि उन्होंने बाद में कई बार मुझसे बात करने की कोशिश की..पर मेरे मन को जो ठेस उनसे पहली मुलाकात में लगी..उससे मैं उबर नहीं पाई..ना ही उनकी पहचान छुपाने की वजह समझ पाई...


नीलम राज

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