मन की न कहपातीं स्त्रियाँ

मन की न कहपातीं स्त्रियाँ

अधिकांशतः आज भी मन की न कह पाती स्त्रियाँ

जो कह दें बेधड़क जो छिपा सीने में उनके
तो बद्तमीज संस्कारहीन कुसंस्कारी कहलाती स्त्रियाँ।।
बाबुल के अंगना से चुप्पी माँ से सीख आईं
वर्चस्व पिता का घर में औ भाई की सुनवाई
ये फर्क सिर्फ कहने का नही
कितनी दफा महसूस करवाई जातीं स्त्रियाँ
वक्त कितना भी है बदला पर 
अधिकांशतः आज भी मन की न कह पाती स्त्रियाँ।
दिल लगाते,दिल्लगी करते,आदमी जात है कहकर
माफ़ कर दिये जाते 
विधुर जो हों ये,,  देकर बच्चों की दुहाई दूजे ब्याह के 
ऐलान तुरन्त किये जाते
क्यों एकाकीपन बच्चों की परवरिश हिस्से उसके आती
क्यों स्वचछन्द आज भी नही जी पातीं स्त्रियाँ।
हाँ अधिकांशतः आज भी मन की न कह पाती स्त्रियाँ
जो कह दें बेधड़क जो छिपा सीने में उनके
तो बद्तमीज संस्कारहीन कुसंस्कारी कहलाती स्त्रियाँ।।

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