मेनोपॉज़: Poetry By Deepali Sanotia

मेनोपॉज़: Poetry By Deepali Sanotia

क्या आसान होता है छोड़ना जो हाथ में आया है 

ये कैसा अपनापन मैंने अपने साथ में पाया है 

अपनेपन की आड़ में बरग़लायी-सी जाती हूँ 

हर बार यहाँ अपने हाथ खाली ही पाती हूँ 

क्या आसान होता है मायूसियों को पचाना 

ये मायूसियाँ तो सिर चढ़ कर बोलती हैं 

क्षण-क्षण इर्द-गिर्द के भेद ये खोलती हैं 

अपनों की ही दी हुई ये कैसी प्रवंचना है।


शरीर में चलने वाले कारखानों में एक कारखाना बंद होने की कागार पर है 

ये दुनिया उसे मेनोपॉज़ कहती है 

कहती है कि ये तो सभी को होता है 

इसमे दुनिया की क्या खता है 

"सिर दुख रहा है मैं तनाव में हूँ ज़रा तेल मलिश तो कर दो कि मैं ही तो मुखिया हूँ "

"अरे मम्मी, क्या सोती रहती हो; आप तो अभी से बूढ़ी हो रही हो"

ये अपनों की सुनाई घुट्टी है चुपचाप ही पीना है 

हाथ-पांव ना जाने कितने फूल रहे हो 

सभी के हाथों में ही सबकुछ देना है 

अपनों की ही दी हुई ये कैसी प्रवंचना है।


यहाँ क्या कोई समझ पा रहा है कि अब कैसे-कैसे अनुभव होना है 

क्षण भर में गहरा अवसाद घिर आएगा 

मैं यहाँ क्यूँ हूँ ये सवाल गहरा करता जाएगा 

क्या कोई और जगह है जहाँ मुझे जाना है 

उम्र के इस नाज़ुक दौर में मुझे समझ ही नहीं रहा ये ज़माना है 

अपनों की ही दी हुई ये कैसी प्रवंचना है।


अब तक खुद को ही महत्व नहीं दिया 

जो कुछ भी किया अपनों को महत्व देकर ही किया 

कतरा-कतरा जो एकत्रित होता है 

वो रगों में दौड़ता प्राणरस चंद दिनों में ही खोना है 

भारी-सा हो जाए सिर, झिलमिल-झिलमिल दृश्य होना हैं 

ये कैसी ज़िम्मेदारी की माथे पर एक भी सलवट नहीं होना है 

अपनों की ही दी हुई ये कैसी प्रवंचना है।


जो अब तक संभाला था वो कहीं खो रहा है 

मेरा वजूद खुद मुझसे ही अनगिनत  प्रश्न कर रहा है 

क्या अब तक जैसी जी हूँ वैसी आगे भी जी पाऊँगी 

बदलते तन के साथ क्या मन को ऐसा ही पाऊँगी 

क्या मुझे अपनेपन की दरकार नहीं 

क्या मेरे अपनों को मेरी फ़िक्र, तनिक मुझसे प्यार नहीं 

रह-रह कर मन ऐसी ही उलझनों में खोना है 

अपनों की ही दी हुई ये कैसी प्रवंचना है।


स्वरचित एवम् मौलिक 

दीपाली सनोटीया 

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