मानसिक रोग को हल्के में तो नहीं ले रहीं?

मानसिक रोग को हल्के में तो नहीं ले रहीं?

आजकल के भागदौड़ वाले, तनाव से भरे जीवन में छोटी छोटी मानसिक समस्याएँ होना आम बात है। चिन्ता तब होनी चाहिए जब जिन्हें आप साधारण मूड स्विंग समझ रही हैं वो रोज की बात हो जाए।


जब अकारण रोने का मन करे

जब दैनिक क्रिया कलाप भी आपको बोझ से लगें

किसी कार्य में मन न लगे और बिस्तर से उठने का दिल ही न करे।

आसपास के नजदीकी लोगों से भी बात करने की इच्छा न हो।

किसी का हँसी मजाक आपमें चिड़चिड़ापन पैदा करे।


किसी खास वजह से ये सब होना सामान्य बात है परन्तु अकारण ऐसा होना चिन्ता जनक है।

कई बार दूसरे लोग इस समस्या को नहीं समझ पाते और पीड़ित व्यक्ति को समझाने का प्रयास करते हैं कि सब कुछ तो है तुम्हारे जीवन में, जब कोई कमी नहीं तो क्यों दुखी हो। दरअसल ये सोच ठीक नहीं है। ऐसे रोगी का अपने क्रियाकलापों पर बस ही नहीं है, वह जानबूझकर ऐसा नहीं करता बल्कि खुशी देने वाले हारमोन ऑक्सीटोनिन का बनना उसके शरीर में कम हो जाता है।

इस परेशानी को हल्के में नहीं लेना चाहिए क्योंकि स्थिति गंभीर होने पर ऐसे रोगी आत्महत्या तक के लिए उद्धत हो जाते हैं।

यद्यपि आजकल ये समस्या आम हो चुकी है फिर भी परिवार वाले और रोगी स्वयं इसके लिए डॉक्टर की सलाह लेने से बचना चाहते हैं। उन्हें लगता है कि उन्हें पागल समझा जाएगा। जबकि ऐसा है नहीं, बदली जीवनशैली, व कुछ दवाओं की सहायता से रोगी पूरी तरह सामान्य जीवन बिताते हैं।

जिस प्रकार किसी भी शारीरिक समस्या के लिए हम डॉक्टर की सलाह से दवा लेते हैं ठीक उसी प्रकार हमें मानसिक परेशानियों को समझ कर उसके लिए भी मानसिक रोग विशेषज्ञ डॉक्टर और मनोवैज्ञानिक परामर्शदाता की सलाह लेनी चाहिए। बहुत बार इनकी काउंसलिंग से रोगी बहुत बेहतर महसूस करते हैं, अतः स्थिति की गम्भीरता को समझ कर सही समय पर सही उपाय करें।


archana saxena

What's Your Reaction?

like
1
dislike
0
love
0
funny
0
angry
0
sad
0
wow
0