मानसिक स्वास्थ्य- अब मेरा क्या होगा ?

मानसिक स्वास्थ्य- अब मेरा क्या होगा ?

रात भर सोना नहीं, दो -एक घंटे की कच्ची-पक्की नींद लेकर उठते ही फिर वही रोना-धोना मचा देना,"अब मेरा क्या होगा, अब मेरा क्या होगा?"यह सिलसिला रोज का होने लगा सुहानी के लिए।

दरअसल सुहानी एक होनहार छात्रा थी। बचपन से ही उसे पढ़ाई का शौक था और वह अपने आप को पढ़ाई में ही निपुण समझती थी। 12वीं में बहुत अच्छे अंको से उत्तीर्ण हो, मनपसंद कॉलेज में दाखिला ले, उसने स्नातक की पढ़ाई भी बहुत अच्छे अंको से उत्तीर्ण की थी।

फिर वह आगे की पढ़ाई के लिए प्रवेश परीक्षा की तैयारी करने लगी। तीन-चार अलग-अलग जगह से उसने प्रवेश परीक्षा के लिए पत्र भरा था। पूरी जी जान लगाकर दिन-रात एक कर कर वह इन परीक्षाओं की तैयारी में लगी रही। परंतु दुर्भाग्यवश वह किसी भी प्रवेश परीक्षा में इतना पद नहीं ला पाई कि उसे अपने पसंद के कॉलेज में दाखिला मिल सकता।

उसकी सभी सखी सहेलियों का दाखिला किसी ना किसी कॉलेज में हो ही गया था। सुहानी की सखियां पढ़ाई के साथ-साथ घूमना फिरना और मजे भी करती थी। सुहानी केवल पढ़ाई पर भी ध्यान देती थी, उसके बाद भी उसकी सखियों का दाखिला हो गया परंतु उसका उसके पसंद के कॉलेज में नहीं हुआ, इस झटके को वह बर्दाश्त नहीं कर पाई।वह व्यग्रता और अवसाद का शिकार हो गई।

सारा दिन बस रोती ही रहती थी। उसका कहना था, "मैंने बचपन से सिर्फ पढ़ाई ही की है और मैं पढ़ाई ही कर सकती हूं। अगर पढ़ाई के बल पर भी मेरा कुछ नहीं होता तो इसका मतलब मैं कुछ नहीं कर सकती अपनी जिंदगी में, मेरी जिंदगी खराब हो गई है।"

उसको बहुत समझाया गया, "तुमने पहली बार ही प्रवेश परीक्षा दी है, बच्चे कई-कई बार प्रवेश परीक्षा देते हैं और तब कहीं जाकर उन्हें उनकी पसंद का कॉलेज मिलता है, तुम पहली ही बार में हार कैसे मान सकती हो?"

पर वह कुछ समझने को तैयार ही नहीं थी, उसके अंदर हार का भय इस कदर बैठ गया था कि अब दोबारा किताब उठाने पर उसके हाथ कांपते थे। उसके घर वालों ने उसे समझाया कि वह एक बार घर से बाहर निकले, कुछ छोटा-मोटा काम करने की कोशिश करें और थोड़े वक्त के लिए पढ़ाई से विराम ले ले।

परंतु उसका आत्मविश्वास इतना टूट गया था कि उसे अब स्वयं पर भरोसा ही नहीं रहा था, उसका कहना था," अगर मैं पढ़ाई नहीं कर सकी, तो मैं कुछ नहीं कर सकती क्योंकि मैंने सिर्फ बचपन से पढ़ाई ही की है और मुझे पढ़ाई ही करनी आती है,मैं जहां पर भी जाकर काम करने का प्रयत्न करूंगी मैं उनका ही काम खराब कर दूंगी, मैं किसी लायक नहीं रही।"

धीरे-धीरे उसकी मानसिक स्थिति बहुत खराब होने लगी। सुबह से लेकर रात तक केवल रोना रोना और रोना। इसके अतिरिक्त वह कुछ नहीं करती थी। उसके माता-पिता बहुत ही दुखी और विचलित रहने लगे थे। उसका छोटा भाई गगन भी उसकी स्थिति को देखकर अपनी पढ़ाई पर ध्यान नहीं दे पा रहा था। पूरा घर टूटता सा नजर आ रहा था।

वह स्वयं को खत्म करने की कोशिश करने लगी। बात हाथ से निकलता देख उसके माता-पिता ने मनोचिकित्सक से सलाह लेना उचित समझा। परंतु कुछ समय बाद देखा गया कि उसका भी उस पर कोई सकारात्मक असर नहीं हो रहा है।

जब उसकी दादी को उसकी स्थिति का पता चला तो वह गांव में सब छोड़-छाड़ कर अपनी पोती के पास आ गई। जब सुहानी से सब आस छोड़ चुके थे, स्वयं सुहानी भी खुद से आस छोड़ चुकी थी, तब उसकी दादी ने आकर उसको अवसाद से निकालने का बीड़ा उठाया।

घर में सकारात्मक ऊर्जा बनाने के लिए उसकी दादी ने दिन-रात भजन चलाने शुरू किए। सुहानी से उसकी पढ़ाई या भविष्य को लेकर कभी कोई बात नहीं की अपितु वह उसे अलग-अलग छोटी-छोटी प्रेरक कहानियां सुनाती रहती। उसको बैठाकर ओम की ध्वनि चला उसके सर की और हाथ पैरों की मालिश करती। जब भी सुहानी रोती धोती तो उसकी बात पूरे ध्यान से सुनती,परंतु उसको कुछ भी ना कहती। थोड़ा सुधार आने पर वह सुहानी को सुबह अपने साथ बाहर पार्क घुमाने के लिए लेकर जाती, उसे योगा करवाती, उसको ध्यान पर अपने साथ बैठाती। रात को उसे योगनिद्रा की मदद से सुलाती।

जब सुहानी की स्थिति में थोड़ा सुधार और आया तब उन्होंने उससे फिर से प्रवेश परीक्षा में बैठने की बात की। पहले तो सुहानी डर गई परंतु फिर उसने अपनी दादी से पूछा,"क्या आप यही मेरे साथ रहेंगे,जब तक मेरा दाखिला नहीं हो जाता?"

दादी ने हामी भर दी। धीरे-धीरे सुहानी का आत्मविश्वास फिर से लौटने लगा और उसने प्रवेश परीक्षा में बैठने के लिए पढ़ाई शुरू कर दी। दुर्भाग्यवश सुहानी का दाखिला फिर से कहीं नहीं हो पाया। परंतु इस बार वह अवसाद में नहीं गई।

इस बार उसकी दादी ने उसका मन पक्का बनाकर उसे तैयार किया था कि वह पास भी हो सकती है और नहीं भी हो सकती।बहुत ही समझदारी से उसकी दादी ने उसका दाखिला दूरस्थ शिक्षा में भी करवा रखा था।

उसने दूरस्थ शिक्षा से आगे की पढ़ाई करते हुए नौकरी की। 2 साल बाद जब उसकी पोस्ट ग्रेजुएशन पूरी हुई तो उसे उसी नौकरी में और अच्छी पदवी मिल गई।


कुछ बातें जो उसकी दादी ने उसे समझाई, वह उसके बहुत काम आई।

पहली बात- जिंदगी में कभी एक योजना बनाकर आगे नहीं बढ़ना चाहिए, यदि वह योजना काम ना करें तो आपके पास दूसरी योजना होनी चाहिए।

दूसरी बात - अपने आपको मानसिक और शारीरिक रूप से तंदुरुस्त रखना चाहिए, उसके लिए योगा और ध्यान करना आवश्यक है।

तीसरी बात - जिंदगी में कभी अपनी तुलना दूसरों से नहीं करनी चाहिए।

चौथी बात - कभी हार नहीं माननी चाहिए। यदि गिर जाओ, तो फिर उठकर संभालना चाहिए।

पांचवी बाद - अतीत की गलतियों से सीखना चाहिए परंतु अतीत को हमेशा अपने साथ लेकर नहीं चलना चाहिए।

छठी बात - मरना किसी चीज का समाधान नहीं होता। जितना समय धरती पर लिखवा कर आए हो, उतना तो गुजारना ही पड़ेगा, अब तुम्हारी इच्छा है शारीरिक रूप में गुजारते हो या बिना शरीर के।

सातवीं बात - अपनी परेशानियों से उभरने की भरपूर कोशिश करनी चाहिए और निकलना भी चाहिए - अपने लिए नहीं, तो अपनों के लिए।

आठवीं बात - स्वयं से प्रेम करो, स्वयं पर भरोसा करना कभी ना छोड़े।

नवी बात - याद रखें कि हर चीज हर किसी के लिए नहीं बनी है, यदि बहुत कोशिश करने पर भी आपको वह चीज नहीं मिलती जो आप चाहते हैं तो समझ ले कि वह आपके लिए नहीं बनी है और उसमें ईश्वर की इच्छा सम्मिलित नहीं है।

10वीं और सबसे महत्वपूर्ण बात - जिंदगी में हर पल हर घड़ी ईश्वर आपके साथ हैं, अपना भरोसा बनाए रखें और उसकी उंगली पकड़कर चलते जाएं।





दरअसल सुहानी एक बहुत ही होनहार छात्रा थी। बचपन से ही उसे पढ़ाई का शौक था और वह अपने आप को पढ़ाई में ही निपुण समझती थी। 12वीं में बहुत अच्छे अंको से उत्तीर्ण हो, मनपसंद कॉलेज में दाखिला ले, उसने स्नातक की पढ़ाई भी बहुत अच्छे अंको से उत्तीर्ण की थी।


फिर वह आगे की पढ़ाई के लिए प्रवेश परीक्षा की तैयारी करने लगी। तीन-चार अलग-अलग जगह से उसने प्रवेश परीक्षा के लिए पत्र भरा था। पूरी जी जान लगाकर दिन-रात एक कर कर वह इन परीक्षाओं की तैयारी में लगी रही। ना दिन-रात का होश, ना खाने-पीने की सुध रहती थी उसे। परंतु दुर्भाग्यवश वह किसी भी प्रवेश परीक्षा में इतना पद नहीं ला पाई कि उसे अपने पसंद के कॉलेज में दाखिला मिल सकता।


उसकी सभी सखी सहेलियों का दाखिला किसी ना किसी कॉलेज में हो ही गया था। सुहानी की सखियां पढ़ाई के साथ-साथ घूमना फिरना और मजे भी करती थी। सुहानी केवल पढ़ाई पर भी ध्यान देती थी, उसके बाद भी उसकी सखियों का दाखिला हो गया परंतु पर उसका उसके पसंद के कॉलेज में नहीं हुआ, इस झटके को वह बर्दाश्त नहीं कर पाई।वह व्यग्रता और अवसाद का शिकार हो गई।


सारा दिन बस रोती ही रहती थी। उसका कहना था, "मैंने बचपन से सिर्फ पढ़ाई ही की है और मैं पढ़ाई ही कर सकती हूं। अगर पढ़ाई के बल पर भी मेरा कुछ नहीं होता तो इसका मतलब मैं कुछ नहीं कर सकती अपनी जिंदगी में, मेरी जिंदगी खराब हो गई है।"


उसको बहुत समझाया गया, "तुमने पहली बार ही प्रवेश परीक्षा दी है, बच्चे कई-कई बार प्रवेश परीक्षा देते हैं और तब कहीं जाकर उन्हें उनकी पसंद का कॉलेज मिलता है, तुम पहली ही बार में हार कैसे मान सकती हो?"


पर वह कुछ समझने को तैयार ही नहीं थी, उसके अंदर हार का भय इस कदर बैठ गया था कि अब दोबारा किताब उठाने पर उसके हाथ कांपते थे। उसके घर वालों ने उसे समझाया कि वह एक बार घर से बाहर निकले, कुछ छोटा-मोटा काम करने की कोशिश करें और थोड़े वक्त के लिए पढ़ाई से विराम ले ले।


परंतु उसका आत्मविश्वास इतना टूट गया था कि उसे अब स्वयं पर भरोसा ही नहीं रहा था, उसका कहना था," अगर मैं पढ़ाई नहीं कर सकी, तो मैं कुछ नहीं कर सकती क्योंकि मैंने सिर्फ बचपन से पढ़ाई ही की है और मुझे पढ़ाई ही करनी आती है,मैं जहां पर भी जाकर काम करने का प्रयत्न करूंगी मैं उनका ही काम खराब कर दूंगी, मैं किसी लायक नहीं रही।"


धीरे-धीरे उसकी मानसिक स्थिति बहुत खराब होने लगी। सुबह से लेकर रात तक केवल रोना रोना और रोना। इसके अतिरिक्त वह कुछ नहीं करती थी। उसके माता-पिता बहुत ही दुखी और विचलित रहने लगे थे। उसका छोटा भाई गगन भी उसकी स्थिति को देखकर अपनी पढ़ाई पर ध्यान नहीं दे पा रहा था। पूरा घर टूटता सा नजर आ रहा था।


वह स्वयं को खत्म करने की कोशिश करने लगी। बात हाथ से निकलता देख उसके माता-पिता ने मनोचिकित्सक से सलाह लेना उचित समझा। परंतु कुछ समय बाद देखा गया कि उसका भी उस पर कोई सकारात्मक असर नहीं हो रहा है।



जब उसकी दादी को उसकी स्थिति का पता चला तो वह गांव में सब छोड़-छाड़ कर अपनी पोती के पास आ गई। जब सुहानी से सब आस छोड़ चुके थे, स्वयं सुहानी भी खुद से आस छोड़ चुकी थी, तब उसकी दादी ने आकर उसको अवसाद से निकालने का बीड़ा उठाया।


घर में सकारात्मक ऊर्जा बनाने के लिए उसकी दादी ने दिन-रात भजन चलाने शुरू किए। सुहानी से उसकी पढ़ाई या भविष्य को लेकर कभी कोई बात नहीं की अपितु वह उसे अलग-अलग छोटी-छोटी प्रेरक कहानियां सुनाती रहती। उसको बैठाकर ओम की ध्वनि चला उसके सर की और हाथ पैरों की मालिश करती। जब भी सुहानी रोती धोती तो उसकी बात पूरे ध्यान से सुनती,परंतु उसको कुछ भी ना कहती। थोड़ा सुधार आने पर वह सुहानी को सुबह अपने साथ बाहर पार्क घुमाने के लिए लेकर जाती, उसे योगा करवाती, उसको ध्यान पर अपने साथ बैठाती। रात को उसे योगनिद्रा की मदद से सुलाती।


जब सुहानी की स्थिति में थोड़ा सुधार और आया तब उन्होंने उससे फिर से प्रवेश परीक्षा में बैठने की बात की। पहले तो सुहानी डर गई परंतु फिर उसने अपनी दादी से पूछा,"क्या आप यही मेरे साथ रहेंगे,जब तक मेरा दाखिला नहीं हो जाता?"


दादी ने हामी भर दी। धीरे-धीरे सुहानी का आत्मविश्वास फिर से लौटने लगा और उसने प्रवेश परीक्षा में बैठने के लिए पढ़ाई शुरू कर दी। दुर्भाग्यवश सुहानी का दाखिला फिर से कहीं नहीं हो पाया। परंतु इस बार वह अवसाद में नहीं गई।


इस बार उसकी दादी ने उसका मन पक्का बनाकर उसे तैयार किया था कि वह पास भी हो सकती है और नहीं भी हो सकती।बहुत ही समझदारी से उसकी दादी ने उसका दाखिला दूरस्थ शिक्षा में भी करवा रखा था।


उसने दूरस्थ शिक्षा से आगे की पढ़ाई करते हुए नौकरी की। 2 साल बाद जब उसकी पोस्ट ग्रेजुएशन पूरी हुई तो उसे उसी नौकरी में और अच्छी पदवी मिल गई।


कुछ बातें जो उसकी दादी ने उसे समझाई, वह उसके बहुत काम आई।


पहली बात- जिंदगी में कभी एक योजना बनाकर आगे नहीं बढ़ना चाहिए, यदि वह योजना काम ना करें तो आपके पास दूसरी योजना होनी चाहिए।


दूसरी बात - अपने आपको मानसिक और शारीरिक रूप से तंदुरुस्त रखना चाहिए, उसके लिए योगा और ध्यान करना आवश्यक है।


तीसरी बात - जिंदगी में कभी अपनी तुलना दूसरों से नहीं करनी चाहिए।


चौथी बात - कभी हार नहीं माननी चाहिए। यदि गिर जाओ, तो फिर उठकर संभालना चाहिए।


पांचवी बाद - अतीत की गलतियों से सीखना चाहिए परंतु अतीत को हमेशा अपने साथ लेकर नहीं चलना चाहिए।


छठी बात - मरना किसी चीज का समाधान नहीं होता। जितना समय धरती पर लिखवा कर आए हो, उतना तो गुजारना ही पड़ेगा, अब तुम्हारी इच्छा है शारीरिक रूप में गुजारते हो या बिना शरीर के।


सातवीं बात - अपनी परेशानियों से उभरने की भरपूर कोशिश करनी चाहिए और निकलना भी चाहिए - अपने लिए नहीं, तो अपनों के लिए।


आठवीं बात - स्वयं से प्रेम करो, स्वयं पर भरोसा करना कभी ना छोड़े।


नवी बात - याद रखें कि हर चीज हर किसी के लिए नहीं बनी है, यदि बहुत कोशिश करने पर भी आपको वह चीज नहीं मिलती जो आप चाहते हैं तो समझ ले कि वह आपके लिए नहीं बनी है और उसमें ईश्वर की इच्छा सम्मिलित नहीं है।


10वीं और सबसे महत्वपूर्ण बात - जिंदगी में हर पल हर घड़ी ईश्वर आपके साथ हैं, अपना भरोसा बनाए रखें और उसकी उंगली पकड़कर चलते जाएं।

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