मेरी मां#कमजोर नहीं बहादुर बनो#

मेरी मां#कमजोर नहीं बहादुर बनो#

मेरा पूरा संसार मां के इर्द-गिर्द और मां का पूरा संसार हम तीन भाई बहनों के इर्द-गिर्द। बहुत सरल, सौम्य बाहर की दुनिया से अनभिज्ञ।


हमें रोता हुआ नहीं देख सकती। पहले रोना बंद करो फिर सुनूंगी तुम्हारी बात ।रोते हुए आते तो पहले एक तमाचा लगाती, फिर पूछती क्या हुआ? बोलती बहादुर बनो, कमजोर नहीं ।


मैं छठवीं कक्षा में पढ़ रही थी। घर के सामने के मैदान में ही हम बहुत सारे बच्चे खेल रहे थे। दूर कहीं खेलने की इजाजत नहीं देती। बीच-बीच में घर से बाहर निकल हमें मैदान में खेलते हुए देखकर तसल्ली कर लेती। बच्चों को लेकर बहुत ही ज्यादा पजेसिव थी।मां ने इशारे से बुलाया और संध्या दिया देने के लिए कहा। मैंने कहा "थोड़ा सा खेल बाकी है खेल कर आती हूं।


खेल खत्म कर सारे बच्चे दौड़ कर आने लगे। हम बच्चे तो उस समय चलना जानते ही ना थेे।सिर्फ दौड़ अचानक मैं गिरी और मेरे पीछे आते हुए और दो बच्चे मेरे ऊपर गिर पड़े। मेरा हाथ मेरे नीचे ही दबा था। बस! हड्डी टूट गई ।

रोते हुए टूटे हाथ ,साथ में बच्चों का पलटन ,घर पहुंचते ही मां ने पहले तो एक थप्पड़ लगाया फिर पूछा क्या हुआ ? रोंधूं नहीं ,बहादुर बनो ।


मैं जब तक मा नहीं बने मुझे उस थप्पड़ का रहस्य पता ना चला।हमारा दर्द में रोना उन्हें व्यतीत कर जाता था ।दर्द वह ले नहीं सकती थी। दर्द उन्हें अंदर से कमजोर बना देता था ।छटपटाहट कुछ ना कर पाने की असमर्थता ,गुस्से में परिवर्तित हो जाती ,जो तमाचे के रूप में बाहर आती ।


मेरे बच्चे कहीं से रोते हुए आते तो मैं भी ठीक मां की ही तरह कह ती पहले रोना बंद करो फिर सुनूंगी तुम्हारी समस्या। कमजोर नहीं साहसी बनो।


साहसी बनाने का पाठ मैंने मां से सीखा और मां से अपने बच्चों को सिखाया।??

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