मेरा साया साथ होगा

मेरा साया साथ होगा

आज स्नेहा ने अपने वैवाहिक जीवन में पहली बार स्वयं के लिए नहीं बल्कि अपनी बेटी वृंदा के लिए आवाज़ उठाई थी|

वृंदा भी हैरान थी आज अपने माँ के बदले हुए स्वरुप को देखकर| उसे यकीन था कि हर बार की तरह पापा (राजेश) नहीं मानेंगे और उसे अपना मन मार कर आगे की पढ़ाई पत्राचार से करके और घर के काम ही सीखने होंगे|


कुछ दिन पहले ही तो वृंदा का बारहवीं का परिणाम आया था और पढ़ने में शुरू से मेधावी वृंदा ने इंजीनियरिंग के दाखिले की परीक्षा भी पास कर ली थी बस दिक्कत यहीं थी कि एक तो उसे पूना में जाना पड़ता और दूसरा राजेश की संकीर्ण सोच की औरत के अधिक पढ़ने लिखने से वो सिर पर चढ़कर बोलती है| हालांकि स्नेहा स्वयं इक कामकाजी महिला थी |


ना जाने पर पहली बार आखिर स्नेहा ने राजेश को मना ही लिया| बात बात पर आँखों में आँसू भर लाने वाली स्नेहा बहुत उत्साहित होकर उसकी पैकिंग कर रही थी| मात्र दस दिन बाद ही तो वृंदा को कॉलेज जॉइन करना था| दाखिला और होस्टल में प्रवेश सब कुछ हो गया था| अब तो राजेश के ना कहने का कोई प्रश्न ही नहीं था |

माँ को इतना खुश कभी नहीं देखा था वृंदा ने |

बात बात पर सीख देने वाली माँ ने पहली बार दूसरे शहर में पढ़ने जाने के लिए वृंदा को कोई सीख ना दी| इस बात पर बहुत हैरान थी वृंदा|


खैर नियत दिन राजेश जाकर वृंदा को पुणे छोड़कर आ गए| वृंदा ने भी माँ को साथ आने की जिद ना की जानती थी वो माँ को ऐसे किसी को स्टेशन तक भी छोड़ने जाना नहीं भाता था, आंखो से अश्रुधारा नदी के रूप में बह उठती थी फिर आज तो बात बेटी के जाने की थी |


दो दिन हो गए थे वृंदा को होस्टल आए, धीरे धीरे सब सामान कमरे में व्यवस्थित कर रही थी कि अचानक अटैची में एक कोने में दबे एक गुलाबी काग़ज़ पर नज़र पड़ी |

खोलकर देखा तो माँ की लिखावट में लिखा इक पत्र था, झट से खोल कर पढ़ने बैठ गयी |

मेरी प्रिय वृंदा,

आज पहली बार तुम मुझसे दूर जा रही हो और कुछ ऐसी बातें है जो मैं तुम्हें उम्र के इस दौर में समझाना चाहती हूँ |

हर माँ चाहती है कि उसकी बेटी उसकी तरह बने और हर लड़की स्वयं भी अपनी माँ की तरह बनना चाहती है परंतु मेरी बच्ची! मैं नहीं चाहती तुम मेरी तरह बनो | मैंने बचपन से अपने पापा को अपनी माँ पर शारीरिक अत्याचार करते देखा और माँ ना जाने क्यूँ चुपचाप सहती थी और मेरे प्रश्न करने पर उन्होंने मुझमे भी वहीं संस्कार दिए जो शायद उनकी दादी नानी ने उन्हें दिए थे कि पति का घर ही उसका असली घर होता है | छोटी छोटी बातों पर मायके सामान लेकर नहीं आते |

किसी तरह पढ़ाई पूरी करते ही तुम्हारे पिता जी से विवाह हो गया, मेरे पापा और राजेश में सिर्फ इतना फर्क़ था कि राजेश मुझे मानसिक चोट पहुँचाते थे | मेरी कमाई भी उन्हें चाहिए थी परंतु कमाऊ बीवी सिर पर ना चढ़ जाए इसलिए बिना गलती के भी मेरी गलतियाँ निकालते और मैं अपनी माँ की तरह चुपचाप सुनती रहती क्यूंकि विवाह के बाद मेरे बाबा ने तो मानो मुझसे छुटकारा ही पा लिया था | शायद यही वज़ह थी मेरी चुप्पी की और इतने में तुम और काव्य मेरी जिन्दगी में आ गए | तुम दोनों के उज्ज्वल भविष्य की खातिर चुपचाप सहती चली गयी और अनेकों बार तेरे पापा की तुझ पर हुई ज्यादतियों पर भी ना खुद आवाज उठा सकी और ना तुझे आवाज उठाने दी |

परंतु इस बार तेरे भविष्य की जब बात आयी तो मैं चुप ना रह सकी और जब पहली बार मैंने तेरे पापा से दृढ़ता से बात की तो तेरे पापा तुरंत मान गए, शायद उन्होंने भाँप लिया कि औरत सब कुछ सहन कर सकती है पर इक माँ अपने बच्चों पर ज्यादती नहीं |

मेरी बच्ची जीवन में तुम अच्छे से शिक्षित होकर आत्म निर्भर अवश्य बनना और साथ ही साथ अपने जीवन साथी का साथ तो निभाना परंतु उसके द्वारा की गयी पहली ज्यादती पर ही उसे रोक देना क्यूंकि मन और अंतरात्मा पर हर रोज होने वाली चोट दिखाई तो नहीं देती परंतु नासूर बन जाती है |

मैं जानती हूँ कि इस उम्र में तुम्हारे पापा की आदत नहीं सुधार सकती परंतु तुम्हारे लिए हमेशा तुम्हारी माँ खड़ी है | बस तुमसे यही चाहती हूँ कि तुम मेरी तरह ना बनकर सही को सही और गलत को गलत कहने की हिम्मत रखना |

मैं जानती हूँ कि मेरी बेटी बहुत बहादुर है और वो अकेले ही अपने सपने पूरे करने का हौंसला रखती है |

जब कभी तुम्हारे कदम डगमगाये या निराशा हो तो इस चिट्ठी को पढ़ लेना |

तुम्हारी माँ |


वृंदा की आँखों में आज अपनी माँ के लिए गर्व था और मन में दृढ़ संकल्प कि सच वो अपनी माँ या नानी की तरह नहीं बनेगी और अपने आत्मसम्मान से कभी समझौता नहीं करेगी |

(मौलिक एवं अप्रकाशित)

#दिल से दिल तक # पूजा अरोरा

# बेटी

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