मैरिटल रेप पर छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने क्या कहा?

मैरिटल रेप पर छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने क्या कहा?

पत्नी की मर्जी के खिलाफ जाकर संबंध बनाना वैवाहिक बलात्कार है लेकिन इसे अपराध की श्रेणी में नहीं रखा गया है,जबकि खुद संयुक्त राष्ट्र संघ की एक रिपोर्ट के मुताबिक भारत में हर वर्ष शादीशुदा रेप के करीब 75 फीसदी मामले होते हैं।

रेप को तो अपराध माना जाता है लेकिन वैवाहिक बालात्कार को नहीं. आईपीसी में रेप की परिभाषा तय की गई है, लेकिन मैरिटल रेप के बारे में कोई जिक्र नहीं है।

हिंदू मैरिज एक्ट : हिंदू विवाह अधिनियम पति और पत्नी के लिए एक-दूसरे के प्रति कई जिम्मेदारियां तय करता है। इनमें संबंध बनाने का अधिकार भी शामिल है। क़ानूनन यह माना गया है कि शारीरिक संबंध बनाने से इनकार करना क्रूरता है। इस आधार पर तलाक भी मांगा जा सकता है।

छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने 26 अगस्त को अपनी पत्नी के कथित रेप के आरोपी को ये कहते हुए बरी कर दिया कि "कानूनी रूप से विवाहित पत्नी के साथ पति द्वारा यौन संबंध या कोई सेक्सुअल एक्ट रेप नहीं है, भले ही वो जबरन या उसकी इच्छा के विरुद्ध किया हो।
छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसला दिया है। इस फैसले में हाई कोर्ट में कहा गया है कि  पति द्वारा पत्नि के साथ बल पूर्वक बनाया गया यौन संबध किसी प्रकार के बलात्कार के श्रेणी में नहीं आएगा। 

कोर्ट ने एक केस की सुनवाई के तहत यह अहम फैसला लिया है, और पति को मैरिटल रेप के आरोप से मुक्त कर दिया है।ऐसे मामलों में पत्नी की उम्र 18 साल से कम नहीं होनी चाहिए।

केंद्र सरकार ने मैरिटल रेप को अपराध बनाने की सुनवाई में  दिल्ली हाईकोर्ट के समक्ष कहा था  कि वैवाहिक बलात्कार को दंडनीय अपराध नहीं बनाया जा सकता क्योंकि ऐसा करना विवाह की संस्था के लिए ख़तरनाक साबित होगा. यह एक ऐसा चलन बन सकता है, जो पतियों को प्रताड़ित करने का आसान जरिया बन सकता है।

इस बारे में  केंद्र का कहना था कि बहुत सारे पश्चिमी देशों में मैरिटल रेप अपराध है लेकिन ज़रूरी नहीं है भारत में भी आंख मूंदकर इसका पालन किया जाए. केंद्र ने यह भी कहा कि मैरिटल रेप को अपराध घोषित करने से पहले देश की विभिन्न समस्याओं जैसे साक्षरता, महिलाओं की आर्थिक स्थिति, गरीबी आदि के बारे में भी सोचना होगा।

छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट के इस फैसले पर कई लोगों ने ट्विटर पर अपनी नाराजगी जाहिर की. यूजर्स ने कहा कि मैरिटल रेप को अपराध बनाने कि दिशा में ये फैसला काफी पीछे ले जाता है।

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