मुस्कान बिखराते ऊन के मोज़े #सर्दियों की गर्माहट

मुस्कान बिखराते ऊन के मोज़े #सर्दियों की गर्माहट

आजकल जहाँ सर्दियों में हम सब ब्रांडेड गर्म कपड़ों का ज्यादा इस्तेमाल करने लगे हैं वहीं एक समय था जब हम सब बच्चे बड़े चाव से दादी-नानी के हाथ से बने हुए स्वेटर पहन कर इतराते थे।


नानी-दादी के हाथ के बुने हुए स्वेटर का कोई मुकाबला ही नहीं था और ना ही है, मन-भावन डिजाइनों से सजे स्वेटर, मोज़े, स्कार्फ और ना जाने क्या-क्या।


सब बच्चे अपनी पसंद के सुन्दर-सुन्दर डिजाइन डलवाते थे, जैसे मुझे सबसे अधिक वो स्कार्फ भाता था जिस पर दोंनो तरफ ऊन से चोटियाँ बनाई जाती थी, उसे पहन कर मैं वैसे ही खुश होती थी जैसे कोई बच्ची अपने असली लंबे बालों से बनी दो चोटी बांधकर होती थी। क्योंकि मेरे बाल बचपन में मम्मी छोटे-छोटे ही रखती थी तो मुझे कुछ ज्यादा ही शौक रहता था उस दो चोटियों वाले स्कार्फ का और उस पर वो काले रंग का हो तो क्या कहने।


चलो यह तो रही मेरे बचपन के शौक की बात, आज मैं आप सबके साथ इसी से जुड़ा एक और रोचक किस्सा सांझा करने आयी हूँ,

जो कुछ इस प्रकार है,

मेरी बुआ जी को रंग-बिरंगी ऊन के स्वेटर, मोज़े और लड्डू गोपाल जी के लिए गर्म कपड़े बनाने का बड़ा शौक था, मेरी दीदी मतलब बुआ जी की बेटी को उनके हाथ के मोज़े बड़े भाते थे और इसीलिए उन्होंने दीदी की शादी में देने के लिए मोज़े बनाए थे, जो बहुत ही सुन्दर थे।


मैं उस वक्त्त यही कोई पाँच या छः बरस की रही होगी, मुझे वो मोज़े बहुत पसंद आए तो मैंने बुआ जी से बोल कर अपनी गुड़िया के लिए भी वैसे ही मोज़े बनवाए।

मेरी गुड़िया थोड़ी बड़ी साइज की थी, लगभग एक महीने के छोटे बच्चे जितनी।

वैसी ही एक गुड़िया मेरी चचेरी बहन के पास भी थी, वो चाहती थी ऐसे ही मोज़े उसे भी मिल जाए।

समय कम होने की वजह से बुआ जी ने कहा अगली बार उसके लिए भी बना देंगी, पर उसे तो वही मोज़े चाहिए थे।

हम दोंनो ही छोटी थी इसलिए दोंनो जिद्द पर अड़ गई। मैंने कहा बुआ ने मेरी गुड़िया के लिए बनाए हैं इसीलिए मैं वो मोज़े उसे नहीं दूंगी।


उससे छुपाने के लिए मैंने वो मोज़े दीदी की शादी वाली अटैची में रख दिए और रख कर भूल गई। शादी की तैयारियों के बीच किसी का भी ध्यान इस ओर नहीं गया।

दीदी शादी करके ससुराल चली गई। उन्हें इस बारे में कुछ भी नहीं पता था। जब सामान खोलने की रस्म अदा की जानी थी तब उनकी नन्द ने वो अटैची खोली जिसमें वो मोज़े मैंने छुपाए हुए थे।

जब उन्होंने दीदी के मोज़ों के साथ वो छोटे-छोटे मोज़े देखे तो वो बोली भाभी तो पहले से ही छोटे लल्ला की तैयारी कर कर लाई हैं और सब ठहाका मारकर हँस पड़े। दीदी शर्म से पानी-पानी हो गई।


आज भी जब वो किस्सा याद आता है तो जीजू दीदी के मज़े लेने से पीछे नहीं हटते और दीदी भी बुरा नहीं मानती। इसी बहाने सबको खुश होने का एक मौका मिल जाता है। और मैं भी अपने बचपन की इस बात को याद कर मुस्कुराए बिना नहीं रह पाती हूँ।

उम्मीद है मेरा यह लेख आप सब लोगों के चेहरे पर भी जरूर मुस्कान बिखरा जाएगा।


धन्यवाद।

आपकी सखी,

©️शिल्पी गोयल



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