मत करो न ये भेदभाव!- Blog post by Maya Shukla

मत करो न ये भेदभाव!- Blog post by Maya Shukla

भाषा अपने मन के भावों को प्रकट करने का माध्यम है पर यह एक बहुत बड़ी विडंबना है कि लोग पता नहीं क्यों भाषा के माध्यम को लेकर होड़ लगाने लगते हैं । किसी भी भाषा को कमतर क्यों आंकना? मुझे लगता है अगर भाषाएं भी हमारे जैसी इंसान होती, बोल पाती तो वो भी हमसे यही प्रश्न करतीं कि, "क्यों हमारे आपसी संबंधों में फूट डाल रहे हो?" रहने दो न हमें भी मिलजुल कर । हम एक ही तो हैं । हिंदी उर्दू की मौसी, संस्कृत सभी भाषाओं की जननी और हां ! विदेशी बहन अंग्रेजी भी अब हम सबके साथ अच्छे से घुल - मिल गई है। अच्छा सामंजस्य है आपस में हम सबमें, फिर ये भेदभाव क्यों करते हो ?


इसी कड़ी में मैं आपको एक किस्सा सुनाती हूं, मैं हिन्दी की अध्यापिका हूं, एक बार मेरे स्कूल में कुछ दिनों के लिए मेरी ड्यूटी बस एरिया में लगाई गई थी।


मेरा काम था, बस से उतर रहे बच्चों को पंक्तिबद्ध कराके अनुशासन का पालन कराते हुए उनकी कक्षाओं में भेजना।

बसें बारी - बारी से आ रही थीं और बच्चे उतर रहे थे अब चूंकि स्कूल सी. बी.एस. सी. बोर्ड है इसलिए मैं बच्चों को अंग्रेज़ी में ही हिदायतें दी रही थी जैसे कि, please maintain discipline, make a line follow the queue, walk slowly otherwise you may fall down,look straight आदि।


अब इतने में हुआ क्या कि दस नंबर वाली बस के बच्चे उतरने लगे और उसमें से एक कक्षा एक की बच्ची उतरी जो आगे जाकर थोड़ा दौड़ने लगी।


मैंने उसे कहा, stop! walk slowly other otherwise you will fall down beta!! बच्ची ने मेरी बातें सुनी और पीछे पलटकर मुस्कुराते हुए मुझे देखा और धीरे-धीरे चलने लगी। मैं उस कक्षा में पढ़ाती नहीं थी इसलिए मुझे उन बच्चों के बारे में पता नहीं था लेकिन बस कंडक्टर स्वरूप भईया को सब पता था, कि वो बच्ची हमारे स्कूल की आया कमलेश्वरी दीदी की बेटी है। स्वरूप भईया मेरे पास आए और खिसियाते हुए बोले, मैडम! आपने सब अंग्रेज़ी में कहा फिर भी वो बच्ची समझ गई? कैसे?


मैंने कहा, जैसे सब बच्चे समझ रहे थे?

पर मैडम! सब बच्चे तो काफ़ी बड़े घरों से आते हैं!

और ये तो उस गरीब कमलेश्वरी की बेटी है!


मैंने जवाब दिया, तो क्या हुआ? बच्ची पढ़ती तो हमारे स्कूल में ही है! अध्यापक उसको भी उतना ही सिखाते हैं जैसे सब बच्चों को।


मेरे लाख समझाने पर भी स्वरूप भईया संतुष्ट न हुए और उनकी इस असंतुष्टि ने मेरे मन को खिन्न कर दिया।

दरअसल इसमें दोष स्वरूप भईया का नहीं था, हमारे समाज की व्यवस्था ही कुछ ऐसी है कि हम समझते हैं कि अंग्रेज़ी केवल अमीरों की भाषा है । गरीब घर के बच्चों के लिए वह अप्राप्त है।

मैं न जाने कितनी मांओं के मुंह से सुन चुकी हूं,

मैडम! सब विषय अच्छे से करता है मेरा बच्चा बस हिंदी में रुचि नहीं लेता!

अरे ! कैसे लेगा रुचि?


दरअसल ये भेदभाव बच्चे ने नहीं किया ये हम पालकों ने अपने बच्चों के मन में भरा है, क्योंकि हमारा बच्चा मजाल है कि भिंडी या फूलगोभी बोल दे!


हम लोग उसे तब तक घूरते हैं जब तक कि वह लेडी फिंगर और कली फ्लावर न कह दे।

मैं पूछती हूं क्यों भाई? क्यों ये दबाव? क्यों हम अपने बच्चों की अभिव्यक्ति की आज़ादी छीनने में लगे हैं? क्यों बच्चे को उसकी सहज - सरल भाषा में संवाद नहीं करने दिया जाता है? क्यों हम अपने सामाजिक स्टेटस के लिए अपने बच्चों को असहज महसूस करा रहे हैं? क्यों कच्ची उम्र से ही हम अपने बच्चों को भाषाओं के मध्य में भेदभाव करना सिखा देते हैं?

क्यों आखिर क्यों?


सीखने दीजिए न उन्हें स्वच्छंद होकर, मत डालिए उन पर अपनी उम्मीदों का बोझ, बोलने दीजिए न उन्हें अपनी तोतली


भाषा में गोभी, टमाटर, आलू, मटर और यकीन मानिए समय आने पर वो खुद ब खुद टोमैटो, पोटेटो, फ्लावर और ग्रीन पी सीख जायेंगे।


प्रकट होने दो उनकी मासूम भावनाओं को उनकी मातृभाषा में!!??


नहीं तो कहीं हमारे द्वारा भाषा को लेकर सिखाया गया ये भेद - भाव निकट भविष्य में विकट समस्या न बन जाए। हमारे नाती - पोते ही हमारी वाणी न समझ पाएं!


संभल जाइए, अभी भी वक्त है।


"एक दिन भर का बस सम्मान नहीं चाहिए, मुझे तो आपके दिलों में जीवन भर के लिए स्थान चाहिए।"


हम हिंद वाले हैं, हां हम हिंदी वाले हैं!!


#हमहिंदवालेहैं

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