माता सीता का चरित्र चित्रण

माता सीता का चरित्र चित्रण


महि से प्रगट हुई चाँद सी ज्योत्सना लिए,
आभा मुखमंडल पे रबि सा उजास है।
मिथिला नरेश के राज्य राजधानी में,
सखिन्ह संग करती हास परिहास है।
कौशल किशोर श्रीराम रघुराई संग,
ब्याह के आयी सिय अबध रनिवास है।
कठिन करम गति मेटि न जाय बिधि,
जनक दुलारी स्वीकारो वनवास है।

त्याग कर भूषन-बसन जोगिया रूप धारे,
महलों से निकली सिय सुकुमारी है।
नहि मन वेदना है तन श्रम हारे को,
संग रघुराई के वनहु सुखारी है।
माता-पिता,भाई-बन्धु स्वारथ के नाते है,
पिया बिन सूना सब मन में बिचारी है।
चल दी सब त्याग मोह महलों का राज वैभव,
कीरति छाई ज्यों बिधु उजियारी है।

बनी अनुगामिनी श्रीराम चरण बिंदु की,
हर्षित मन वन को धाई है जानकी।
कीरति अनूप बिधु पावन शुचि गंगधार,
जोती जगाई कुल मान सम्मान की।
नयनन सनेह जल गर्व शीश ऊंचो भयो,
पुलकित हृदय से लगाई है जानकी।
मिथिला का मान जो कौशल की शान थी,
करि न सकी रक्षा निज स्वाभिमान की।

हरी दससीस ने बिठाई अशोक तरु,
बानरों की सेना तब सजाई श्रीराम ने।
सात समंदर पार रामजी ने पाई सुधि,
मुद्रिका गिराई तब श्री हनुमान ने।
जीत के निशाचरों को मान सहित लाये सीय,
सत्य की शपथ तब दीन्ही कृशानु ने।
मन बेदना "बिंदु" क्यों कर बखान करें,
प्रजा के कुतर्कों से त्यागी श्रीराम ने।

शीला द्विवेदी "अक्षरा"
उत्तर प्रदेश "उरई"


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